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पानी जैसा तरल और पहाड़ जैसा कठोर शहर है उदयपुर। झीलों के घाट और पहाड़ों की घाटियां इसकी विरासत है। अरावली पर्वतमाला ने इसको वन वैभव ही नहीं, धातु और पाषाण समृद्धि भी दी। यह पहाड़ियों के बीच पहाड़ गुण जैसा शहर है।मान्यता यह भी थी कि पहाड़ियों में पनाह लेने वाला बच जाता है जबकि अनजान शत्रु भटककर खत्म हो जाते हैं। निश्चित ही यह प्राकृतिक दुर्ग जैसी स्थिति वाला क्षेत्र था। फिर, जल विभाजक रेखा वाला यह क्षेत्र किसी भी कुदरती जलजले से सुरक्षित था।

उस दौर में जबकि अक्षय द्वितीया और अक्षय तृतीया जैसी तिथियों पर जांगल, गुजरात और मारवाड़ में बड़े महत्व के नगर बसाए जा चुके थे, ऐसे में उदयपुर के निवेश के लिए भी इसी तिथि को चुना गया। उदयसागर जैसी झील, उदयश्याम देवालय और उदयपुर जैसे नगर की तिकड़ी इसी तिथि ने साधी। बिना किसी प्रचार और आडंबर के यह सब निर्माण और निवेश हुआ। बहुत बाद में, महाराणा राजसिंह के काल में इस निवेश की संवत 1622 की स्मृति को कवि रणछोड़ भट्ट ने राजप्रशस्ति और अमरकाव्य में महत्व दिया :

राणा उदयसिंहोथ स दिव्योदय सागरम्।

तथोदयपुरं चक्रे तडागोत्सर्ग कर्मणि।। (राजप्रशस्ति 4, 17-18)

सोमवार, कृतिका नक्षत्र, गरकरण और सौभाग्य योग वाली उस तृतीया तिथि का चयन इस नगर के विकास का सदा सर्वदा कारण बना। पीछोला के पश्चिमी तट पर महल बने और नवीन रूप में नगर का निवेश हुआ। इसकी पहचान विशेष रूप से ओल, पोल, सेहरी, देहरी, टिंबा, घाटी और बाड़ी से हुई। हट्टों और चौहट्टों का क्रमिक विकास निरंतर रहा। ये सब नाम अनोखे और अनन्य हैं। महाराणा प्रताप की नीति के तहत यहां बाड़ियों में निवास के घर बने और महाराणा अमर सिंह, कर्णसिंह तथा जगतसिंह ने शांतिकारक उपायों को प्राथमिकता दी। महाराणा राजसिंह ने ससैन्य मालपुरा तक चढ़ाई कर अपना पराक्रम दिखाया तो मुगलिया फौज़ ने इस नगर को नष्ट करने का सोचा। आक्रमण का यह सिलसिला सिंधिया, पिंडारियों और मराठों ने भी रखा। यही कारण है कि उदयपुर की रचना एक किले जैसी होती गई। पानी और परकोटे से घिरे इस नगर को मोर्चा लेने जैसा बनाया गया। दक्षिण दरवाजे में रमणापोल (उदियापोल), माछला मगरा, एकलिंगगढ़ और उससे आगे तारा बुर्ज, नीचे कृष्णपोल, इंद्रगढ़, बड़ीबुर्ज, पूर्व दक्षिण के बीच कमलियापोल, कृष्णपोल मरहला, सूरजपोल, सुरजगढ़ मरहला, घन बुर्ज,  ज्वालामुखी बुर्ज, दिल्ली दरवाजा, दिल्लीगढ़, सारणेश्वरगढ़, दंडपोल, हाथीपोल, शमशेरगढ़, चांदपोल, अंबावगढ़ मरहला, ब्रह्मपोल, शिताबपोल, नाव का कारखाना और जलबुर्ज जैसी जगह महाराणा के सैनिकों ही नहीं, सामंतों की ससैन्य तैनातगी तय की गई। आज अनेक स्थानों के नाम भी नहीं बचे। कितना बड़ा सच है कि उदयपुर सदैव संघर्ष के लिए तत्पर रहा। इस नगर की स्थापना संघर्षकालीन सोच का परिणाम थी और अंग्रेज रेजिडेंट की नियुक्ति तक यह लोहा लेता रहा लेकिन समृद्धि तथा विस्तार भी इसे विरासत में मिले हैं।

सुंदर पक्ष यह भी है कि उदयपुर सर्वऋतु जैसा नगर है। कूप, कुई, बावड़ी और सरोवरों का नगर है। यहां के अभिलेखों, गजलों, विलास और रासो में पनिहारियों के पानी भरने के सुंदर प्रसंग इस नगर के सौंदर्य को अभिव्यक्त करते हैं। यहां के पत्थरों को भी सौभाग्य का धनी कहा है : भाटो दूं सौभागियो, पीछोला री टग्ग। गुलनंजियां पाणी भरे, माथै दे दे पग्ग।। जेम्स टॉड ने यहां से कूच करते समय कहा कि यह नगर छोड़ने जैसा नहीं है, उड़ने को परियों के पंख भी मिल जाए तो भी फिर से आने का मन होता है।कहा यह भी जाता है :

घर बाड़ी गल बावड़ी,

घेरी रुंखा छाह।

कोयल केक कबूतरा,

वाह उदयपुर वाह!!