हाइफा : घुड़सवार भारतीय सैनिकों की शौर्य गाथा, जिसको आज भी इजराइल में बच्चे फक्र से पढ़ते हैं, और हम

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The Battle of Haifa

जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर की रियासत ने मिलकर लड़ी की अद्भुत लड़ाई, 400 साल के साम्राज्य को फेंक दिया था उखाड़कर

Sunil Pandit, Editor The Udaipur Updates

दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में से एक है इसराइल। ये विश्व का पहला यहूदी देश भी है। कहते है भारत की आजादी के बाद फिलीस्तीन भी तीन भागों में बंटा। जिसमें एक हिस्सा यहूदियों को इजराइल के रूप में जबकि बाकी दो हिस्से अरबों को मिला जो आज फिलीस्तीन के रूप में है। इसराइल की लेडिज कमांडर, तकनीकी और शिक्षा की चर्चा और तारीफ हर जगह होती है। ये दुनिया को अचंभित करने वाली सबसे छोटी माइक्रो कंट्री है। लेकिन इसराइल पर भारत का एक अहसान ऐसा है कि जिसको इसराइल ताउम्र कभी भूल नहीं पाएगा। हुआ यूं कि यहां की एक ऐतिहासिक सिटी है हाइफा। हाइफा, जेरूसलम से करीब 150 किमी दूर है। जेरूसलम यहुदी, ईसाई और इस्लाम धर्म के अनुयायियों की सबसे पवित्रतम जगह है।

The Battle of Haifa : 23 सितंबर 1918 की बात है। 15वीं कैवेलरी ब्रिगेड को हाइफा जाने का आदेश मिला था। इसमें शामिल घुड़सवार सैनिक जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर रियासत से ताल्लुक रखने वाले थे। ये सैना जैसे ही हाइफा पहुंची इनके सामने तुर्क और जर्मनी की आधुनिक हथियारों से लैस सेना खड़ी थी। हमारे सैनिकों के पास भाले और घोड़े के सिवाय कुछ भी नहीं था। बावूजद इसके हमारी सेना ने मोर्चा खोल दिया और प्राण दाव पर लगा दिए। विधाता भी शायद इस दिन को इतिहास में कन्वर्ट करने का पूरा मानस बना चुके थे। जर्मन और तुर्की की सेना कुछ समझ पाती उससे पहले ही घुड़सवार ब्रिगेड ने दोपहर 2 बजे हाइफा पर धावा बोल दिया। जोधपुर के सैनिक माउंट कार्मेल की ढलानों से हमला कर रहे थे और मैसूर के सैनिकों ने पर्वत के उत्तरी तरफ से हमला शुरू कर दिया। सेना के एक कमांडर कर्नल ठाकुर दलपत सिंह शुरुआत में ही मारे गए। लेकिन उनके बाद डिप्टी बहादुर अमन सिंह जोधा ने मोर्चा संभाला और वे आगे आए। मैसूर रेजिमेंट ने दो मशीन-गनों पर कब्जा करके अपनी पोजीशन ले ली और हाइफा में घुसने का रास्ता क्लीयर हो गया। इसके बाद शुरू हुई आमने-सामने की जंग। एक तरफ घोड़े तो दूसरी तरफ गोलियां। एक तरफ कब्जे की फितरत तो दूसरी तरफ जंग जीतने के लिए प्राण तक लगाने की सोच। पूरे एक दिन चले इस युद्ध में हमारी सेना हर मोर्च पर भारी पड़ी। नतीजा ये रहा कि 400 साल पुराने ऑटोमन साम्राज्य को हमारी सेना ने जड़ से उखाड़ फेंक दिया। इस युद्ध की शौर्य गाथा आज भी इसराइल में बच्चे अपनी किताबों में पढ़ते है।

मैसूर रेजिमेंट का एक सैनिक

The Battle of Haifa : हाइफा युद्ध की वजह

साल 1918 कि बात है पहला विश्व युद्ध उसी साल नवंबर में खत्म हुआ ही था। उससे पहले बारूद की गंध दुनिया के नथूनों पर चढ़ चुकी थी। तब तक यहूदियों का देश इस्राइल बना ही नहीं था। 1918 के सितंबर महीने में ब्रिटिश झंडा थामे लड़ रहे सैनिक समंदर किनारे बसे शहर हाइफा में बहाई समुदाय के आध्यात्यमिक गुरु अब्दुल बहा को रिहा कराने की योजना बना रहे थे। झंडा ब्रिटेन का था, लेकिन इसमें भारत की तीन रियासतों- मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद के सैनिक शामिल थे। जिन्हें अंग्रेजों की तरफ से जर्मन और तुर्की सेना के खिलाफ लड़ना था। हाइफा पर जर्मन और तुर्की सेना ने कब्जा कर लिया था। अपने रेल नेटवर्क और बंदरगाह की वजह से हाइफा रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण जगह थी, जो युद्ध के लिए सामान भेजने के काम भी आती थी। भारतीय सैनिकों को हाइफा, नाजेरथ और दमश्कस को जर्मन-तुर्की सेना के कब्जे से आजाद कराने की जिम्मेदारी मिली जो आज इस्राइल और सीरिया में हैं।

The Battle of Haifa : 44 सैनिकों ने दिया था बलिदान

हर वर्ष भारतीय सेना 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है। इस खास मौके पर उन शहीद सैनिकों को याद किया जाता है जिन्होंने हाइफा की लड़ाई में अपने प्राण न्यौछावर किए थे। वर्ष 1922 में राजधानी दिल्ली में तीन मूर्ति स्मारक का निर्माण उन भारतीय सैनिकों की शहादत की याद में किया गया जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना के तहत इजरायल और फिलीस्तीन के बीच अपनी सेवाएं दीं। जिसे अब गाजा पट्टी के तौर पर जाना जाता है।

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