Rathasen Mata: 2000 फीट से राष्ट्र की करती रक्षा करती है देवी, हाथी महावत ने क्यों लगाई थी छलांग

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नवरात्रि विशेष: हर रोज एक माता की स्टोरी से रूबरू करवाएगी की टीम, मेवाड़ का सबसे ऐतिहासिक मंदिर

सुनील पंडित, एडिटर

प्रकृति के मूल में शक्ति हमेशा से विद्यमान रहती हैं। इसलिए भगवती मां दुर्गा अपने अलग-अलग रूपों में कभी दुर्ग तो कभी किले, कभी पहाड़ तो कभी झरनें और कभी आकाश तो कभी हिमालय पर बिराजमान है। विंध्यवासिनी मां भगवती के रूप और नाम इतने है कि रक्तबीज जब मां से युद्ध करने के लिए आया तो मां ने भी लाखों रूप बना दिए। रक्तबीज ने लाखों देवियों को एक साथ देखकर देवी से बोलने लगा कि हे! देवी, तु मुझसे छल करना बंदकर और अपनी सहेलियों के साथ न आकर अकेले ही मुझसे युद्ध कर। तब मां भगवती कहती है कि है मुर्ख मैं तो चराचर जगत में सिर्फ एक हूं। जिसकी समग्र सोच है, लोक कल्याणकारी नीति है, उत्तम चरित्र और विशाल हृदय है उसके लिए तो मैं एक हूं मगर जिसकी सोच में धृत्ता है या चरित्र में हिनता का भाव है उसके लिए मैं भिन्न-भिन्न हूं। इसलिए मेरा आपस से निवेदन है कि हम भी मां को एक ही रूप में पूजे, ध्याये और आराधना करे। आज हम आपको बताने जा रहे है कि मेवाड़ के सबसे पुराने और पवित्र स्थान राठासेन माता के इतिहास के बारे में। राठासेन माता का नाम अभ्रंश हुआ है जबकि ये वास्तविक नाम है राष्ट्रसेन माता। राष्ट्र की रक्षा और सुरक्षा के लिए देवी बप्पा रावल के गुरू हरितराषि के आह्वान पर यहां बिराजमान हुई। कहते है मेवाड़ का एक राष्ट्र के रूप में और नागदा को उसकी राजधानी के रूप में विकसित किया जा रहा था तब यहां मां का पर्दापण हुआ था। राठासेन माता यहां 2000 फीट की उंचाई पर अपना आसन लगाकर बैठीं हुई है। कहा जाता है कि उंचाई पर मां राष्ट्र पर चारों तरफ निगाहें रखती है। उनके इस भाव से देवी राष्ट्रसेन कहलाती है।

रूठ कर भागने लगी मां

यहां के ग्रामीणों का दावा करते है कि नीमज, खीमज, आमज और पीपलाज की तरह ही ये माता दो बहनें थी। कालांतर में दोनों के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया। कहते है कि छोटी बहन को लात मारने के कारण वो मुख्य मंदिर से कुछ दूरी पर एक चट्टान में समाहित हो गई। बाद में यहीं उनकी पूजा अर्चना कर दौर चला जो आज तक जारी है। उपर मंदिर में दर्शन करने के बाद ही आमजन को लौटना पड़ता है क्योंकि नीचे वाले मंदिर में जाने का रास्ता बंद कर दिया गया है। मंदिर कर्मचारियों का कहना है कि आए दिन होने वाले हादसों को देखते हुए रास्ता बंद किया है। ये मंदिर एकलिंग जी ट्रस्ट के अधीन आता है।

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कैसे पहुंचे यहां

मां के दर्शन करने के लिए आपको उदयपुर से नाथद्वारा बाइपास की तरफ आना होगा। चीरवा टर्नल से आगे एक बोर्ड लगा हुआ है जिस पर झालों का गुड़ा जाने के रास्ते का चिन्ह बना हुआ है। बस इसी रास्ते पर आपको मुड़ना है और मंदिर पहुंचना है। उदयपुर शहर से करीब 20 किमी दूर माना जा सकता है।

हाथी ने लगाई थी महावत के साथ छलांग

झालों का गुढ़ा के ग्रामीण बताते है कि पहले ये राठोड़ों की देवी थी जो रूठ कर झालों पर ठूंठमान हुई। अभी भी कहावत है कि राठोड़ों से रूठी और झालों पर ठूंठी। याीन राठौड़ों से रूठकर मां झाला कुल पर महरबान हुई। ग्रामीण बताते है कि देलवाड़ा पहले राठौड़ों का ही ठिकाना हुआ करता था। बाद में झालों का ठिकाना बना। कहते है कि यहां मंदिर के पीछे देलवाड़ा दरबार के हाथी और महावत की कब्र भी बनी हुई है। कहा ये जाता है कि यहां हाथी के साथ महावत ने छलांग लगाकर अपनी इहलीला समाप्त की थी।

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