गवरी पर गर्विळी जानकारी, मेवाड़ की आत्मा गवरी पर इससे बढ़िया आर्टिकल नहीं मिलेगा

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Gawri Folk Dance Of Mewad

सुनील पंडित, एडिटर The Udaipur Updates

मेवाड़ में एक कहावत है आत्मा ज्यो ही परमात्मा। यानी आत्मा में ही परमात्मा का निवास हैं। मेवाड़ की आत्मा हैं गवरी। अब इसमें भला परमात्मा का निवास न हो ऐसा हो नहीं सकता। गवरी का प्रादुर्भाव भी गौरा-शिव के मिलन से हुआ है। इसलिए इस पूरे खेल में सवा महीने गौरा और शिव की आराधना का खूब बखान किया जाता है। गौरा को भील जाति के लोग अपनी बहन-बेटी और शिव को अपना जवाई मानते है। कहते है जवाई राज शिव पार्वती को अपने ससुराल लेकर आते है और फिर घूम-घूमकर कैलाशी शिव अपनी पत्नी के साथ पूरे सवा महीने भ्रमण करते है। ये प्रकृति में चातुर्मास की बेला होती हैं जो ठंडी राखी यानी भादवे महीने से शुरू होती है। इसी महीने में कभी कृष्ण का जन्मोत्सव की धूम रहती है तो कभी बाबा रामदेव की जमघट। मेवाड़ में इस पूरे महीने सिर्फ गवरी की फटकार उड़ती है। भील जाति के लोग इस पूरे सवा महीने में कठिन साधना करते है और उसके तप से मां गौरज्या यानी पार्वती का प्रसन्न करते है। कहते है गवरी के प्रताप से ही मेवाड़ धनधान्य का आगार यानी भंडार हमेशा से बना रहा। बचपन में मैंने देखा है कि गांव में बारिश नहीं आने पर घर के चौगान में गवरी रमाई जाती थी और फिर गवरी के धूप-धूवाड़े की बीच ही बारिश का आगमन होता। मानो गौरज्या थाली और मांदल का सिंग्नल पाकर गांव के चौबारे में कोहबर में दुल्हन की मानिंद पधार रही है और बारिश उनके आगमन पर चरण पखार की रस्म अदा कर रही हो। गौरज्या और शिव भी भीलों से बड़ी स्नेह रखते है इसलिए तो वो सवा महीने तक राई और भूड़िये के रूप में संग रहते हैं। हम मेवाड़ियों के लिए ये एक ऐसा गर्वीळा अहसास है, जिसके दम पर हम ताउम्र फक्र्र में रंगे नजर आते है।

Photo : Rahul Soni Kumbhalgadh

क्या है गवरी और कैसे शुरू हुई

देवी पार्वती के पिता हिमाचल का जुड़ाव आदिवासी जनजाति के भीलों से गहरा रहा है। हमेशा से माता पार्वती को अपना पीहर हिमालय अधिक प्रिय रहा। कहते है वो साल में सवा महीने अपने पीहर पधारती है और घर-घर जाकर सभी से मिलती है। बस यही कारण है कि गवरी सवा महीने चलने वाला एक नृत्यानुष्ठान है जो देवी गौरज्या यानी माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए खेला जाता है। गवरी मंचन की पहली ही शर्त ये है कि गवरी उस गांव या क्षेत्र में रमी जाएगी जिसके आसपास बहनों का निवास हो। इसके बदले पैरावणी के अलावा कुछ भी शुल्क नहीं लिया जाता है। 40-50 लोगों की ये गवरी सवा महीने तक चलती है तो फिर भील समाज के निर्वहन में तन, मन और धन तीनों लगा देता है।

अल्हड़ मस्ती में हर साल बिखरती है सौंधी महक

ये सवा महीने खेले जाने वाला यह लोकनृत्य मेवाड़ में ही उत्साह के साथ खेला जाता है। देवी आवरा ऐ….. की विशेष शैली में लोकनृत्य गवरी का गायन जितना अनूठा है उतना ही उनकी वेशभूषा और किरदार भी। मुझे बड़ी ताजुब होती है कि आज के हाइटेक जमाने में जहां बड़े स्टूडियो खुल गए है, कई तकनीकी विकसित हो गई है और कला पर कई रिसर्च किए जा रहे है, वहीं यह लोकनृत्य अपनी धून और अपनी अल्हड़ मस्ती में सौंधी महक हर साल बिखेरता जा रहा है। इस समाज के लिए सवा महीने ऐसे गुजारने होते है जैसे कोई पंडित पूरे 4 घंटे हवन अनुष्ठान में बैठा हो। घर-परिवार से दूर रहना, हरी सब्जी का सेवन नहीं करना, पैरों में जूते नहीं पहना, एक समय भोजन करना जैसे कठिन काम किसी साधना से कम नहीं है। देश-दुनिया में कितने ही करप्शन हो रहे है लेकिन आज तक मजाल है कि किसी भील समाज के लोग ने इस व्रत को लेकर कोई गलत काम किया हो। और तो और गवरी खेलने के दौरान गांव से यह लाखों रुपए के जेवर और परिधान उधार लाते है, सजने-संवरने के लिए लेकिन कभी भी इनका इमान नहीं डगमगाया। गवरी में राई और भूड़िया की भूमिका विशेष रहती है। रक्षाबंधन पर खांडे को राखी बांधने के बाद मेवाड़ में थाली-मांदल की थाप पर हर गली-मोहल्लों में गवरी रमी जाएगी।

उनवास में गवरी का उद्गम, देवभूमि तभी से कहलाई

गवरी की मूल कथा को लेकर इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू कहते है कि एक बार धरती पर सारे पेड़ खत्म हो गए। छाया कहा मिले। नौ लाख देवियां परेशान हो गई। पाताल में राजा वासुकी का साम्राज्य था। एक उड़ते हुए भौरे को देखकर देवियां ने पूछा कि धरती पर एक पेड़ नहीं है फिर कहा से आए हो तूम। जबकि तूम तो फूलों का रसिक हो। परेशान होकर भौरे ने कहा कि-मैं पाताल से आया हूं और राजा वासुकी की बाड़ी में लाखों पेड़ है। कहते है देवी पाताल पहुंची और एक-एक देवी एक-एक पेड़ उखाड़ लाने लगी। तभी वासुकी ने फण तानकर रास्ता रोक दिया। देवी अंबा ने गुरज उठाया और फन काटने लगीं। नागिन ने सुहाग की रक्षा मांगी जबकि देवियां पेड़ ले जाने का आतुर थी। वासुकी ने कहा कि-धरती के लोग बड़े पणपंची है। वो पेड़ को काटेंगे और उन पर कुल्हाड़ा चलाएंगे। देवियों ने कहा कि- हम ये पेड़ राजा जैसल की बाड़ी मेें रोपेंगे। राजा पेड़ों के खातिर जान दे देंगे लेकिन पेड़ नहीं कटने देंगे। एक-एक देवी एक-एक पेड़ लेकर आई। जैसे पीपल लाने वाली पीपलाज, नीम लाने वाली नीमज, आम लाने वाली आमज, खेर वाली खेमज, उमर या उदुंबर लाने वाली उमरा, बरगद वाली बड़ली आदि माता कहलाई। खमनोर के पास उनवास मेें पहली बाड़ी लगाई गई थी। बाद में आबू के भानिया जोगी ने हमला कर दिया लेकिन राजा ने सर देकर भी लाखों पेड़ों की रक्षा की। भानिया ने जैसे ही कुल्हाड़ा चलाया दूध-दही की धारा बही। दूसरे में पानी की धारा और तीसरे में प्रलह ही आ गया।

Photo : Rahul Soni Kumbhalgadh

मान्यता: पुराण में कथा का नायक चूड़ मिलता है। यही चूड़ धीरे-धीरे बूड़ और फिर बूड से बूढ़िया बन गया है। इन ग्रामीणों में यह मान्यता है कि शिव हमारे जंवाई हैं और गौरजा अर्थात पार्वती हमारी बहन-बेटी हैं। कैलाश पर्वत से गौरजा अपने पीहर मृत्यु लोक में मिलने आती हैं। गवरी खेलने के बहाने सवा माह तक अलग-अलग गाँव में यह सबसे मिलती हैं। गवरी में सभी कलाकार पुरुष होते हैं। महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं। संपूर्ण गवरी में नायक बूड़िया पूरी गवरी का नेतृत्व करता है। दोनों राइयाँ लाल घाघरा, चूनरी, चोली तथा चूड़ा पहने होती हैं। इनका दाढ़ी-मूँछ वाले मुंह के भाग को कपड़े से ढँका रहता हैं। गवरी के विशिष्ट पात्रों में झामटिया पटकथा की प्रस्तुति देता है तथा कुटकड़िया अपनी कुटकड़ाई शैली से गवरी मे हास्य व्यंग्य का माहौल बनाए रखता है।

विभिन्न खेल: गवरी के मुख्य खेलों में मीणा-बंजारा, हठिया, कालका, कान्ह-गूजरी, शंकरिया, दाणी जी, बाणियां चपल्याचोर, देवी अंबाव, कंजर, खेतुड़ी, बादशाह की सवारी जैसे कई खेल अत्यंत आकर्षक व मनोरंजक होते हैं। भीलों के अनुसार शिव आदिदेव हैं। इन्हीं से सृष्टि बनी हैं। पृथ्वी पर पहला पेड़ श्बड़श् अर्थात श्वटवृक्षश् पाताल से लाया गया था। देवी अंबा और उसकी सहेली व अन्य देवियों के साथ यह वृक्ष लाया गया और पहली बार उदयपुर के पास प्रसिद्ध रणक्षेत्र हल्दीघाटी के पास ऊनवास गाँव में स्थापित किया गया था।

Sunil Pandit, Writer, Anchor, Editor and Blogger

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