जावर माता: मरू भूमि में 2000 साल से निकल रही है धातुएं, इन्हीं खदानों पर आसान लगाकर बिराजीं महिषासुर मर्दिनी

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मेवाड़ का काशी जावर, यहां की महारानी जावर माता की महिमा और इतिहास

उदयपुर से 35 किमी दूर है जावर माइंस। जावर माइंस कभी मेवाड़ का काशी कहलाता था। ये ऐसी भू-धरोहर है जो 2000 साल से भी ज्यादा समय से धातुओं का निकलना जारी है। कह सकते है कि ये धातुओं का विशाल परगना अब भी है और तब भी रहा है। कहते है इस विशाल समृद्धशाली भू-भाग को टूटने के कई प्रयास हुए। तीन बड़े युद्ध झेले मगर आज भी अपनी वैभव गाथा लुटाए जा रहा है। इसके पीछे का कारण है जावर माता। यहां मंदिर में मां महिषासुर मर्दिनी के रूप में तो बिराजमान है लेकिन सौम्य रूप ऐसा है कि देखते ही भक्त मोहित हो जाता है। ग्रामीण कहते है यहां माता स्वयं प्रकट हुई। हाथ की तरफ इशारा करते हुए पुजारी कहते है माता पहले उस पहाड़ पर प्रकट हुई बाद में यहां ज्योत लाई गई। माता का मंदिर नागर शैली में बना हुआ है। इस पूरे मंदिर में सफेद पत्थरों पर आकर्षक कलाकारी देखने लायक है। कहा जाता है कि ये पूरा क्षेत्र उस जमाने में इतना समृद्धशाली था कि यहां छोटे-बड़े 200 मंदिर थे। जिसमें जैन, विष्णु और भगवान शंकर के अलावा कई छोटे-बड़े मंदिर थे। जब एक साथ सभी मंदिरों में सुबह या शाम के वक्त झालर, घंटी, घंटे, घड़ियाल बजते तो काशी जैसा आभास होता। लेकिन बाद में आक्रांताओं ने युद्ध के दौरान अधिकतर मंदिरों को तोड़ दिए।

ऐसा है मंदिर

नागर शैली को ये मंदिर दसवीं शताब्दी के आसपास का है। मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, सभा मंडप और अर्धमंडप आदि बने हुए है। गर्भगृह में महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है। बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, दिक्पाल, देवांगनाएं तथा नृत्य वादन करती प्रतिमाएं मोहित कर देती है। कहा जाता है यहां महाराणा रायमल का राजतिलक भी जावर में ही हुआ था। महाराणा कुंभा की राजकुमारी रमाबाई द्वारा निर्मित रमाकंड के पास रामस्वामी नाम का विष्णु मंदिर भी मौजूद है। इस मंदिर को अल्लाउद्दीन खिलजी ने, महाराणा रायमल के शासन में मालवा के सुलतान ने और महाराणा प्रताप के समय शाहबाज खाने आक्रमण कर तोड़ दिया।

जावर में जस्ते और सीसे की खानें

यहां खनन के 2000 साल पुराने सबूत मिलते है। जो बताते है कि ये क्षेत्र तब भी बहुत समृद्धशाली रहा है। अयस्क को पिघलाकर सीसा व जस्ता बनाने के लिए प्रयोग होने वाले सिकोरे यानी रिटोर्ट आज भी जावर में मौजूद है। इसके इतिहास की बात करे तो जावर दुनिया में सबसे पहले यशद देने वाली खदान के लिए प्रख्यात है। इस क्षेत्र को सबसे पहले धातुओं को धातु रूप में प्राप्त करने के लिए वाष्पीकृत करने की पहली विधि खोजने का श्रेय भी जाता है।

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