जलदेवी : जल में सास-बहू का अनूठा मंदिर, इसी जगह के प्रताप से अकबर को मेवाड़ छोड़ कायर की तरह भागना पड़ा

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jaldevi mata ji temple sansera, Relmangra

नवरात्रि विशेष : दूसरे दिन हमारी टीम पहुंची सांसेरा जलदेवी, जानिए यहां की महिमा और इतिहास

4 महीने जल में समाधिस्थ, महाराणा प्रताप के लिए चित्तौड़ छोड़ आई तो कहलाई सांसेरा की जलदेवी, तालाब का नाम बादशाह मंगरी

Sunil Sharma, The Udaipur Updates

प्रकृति के बीच अगर आपको नवरात्रि में साक्षात देवी का शांत रूप देखना है तो आइये सांसेरा जलदेवी। यहां मां पानी के बीच अपना आसन लगाकर सास-बहू के रूप में बिराजमान है। पानी के बीच सेतु और बीचों-बीच मां का भवन। सामने खड़ी जलदेवी और चरण पखारती जलधारा देखकर लगता है कि हम कलयुग से निकलकर सतयुग के किसी दृश्य के साक्षी हो रहे है। यहां मां के दो मंदिर हैं। एक सामने खड़ी प्रतिमा के रूप में और दूसरी जल में समाधिस्थ। दोनों के बीच प्रेम और स्नेह की डोर ऐसी है कि आज तक ये कोई पता नहीं लगा पाया कि कौन सास है और कौन बहू। हालांकि जल में बिराजी मां जलदेवी के लिए कयास लगाए जाते है कि वो ही बड़ी सास है। उसका आधार ये है कि इस मां की प्रतिमा पूरे 4 महीने जल में ही समाधिस्थ रहती है। जबकि सामने खड़ी प्रतिमा तक पानी नहीं पहंुच पाता है। यहां इतिहास, आस्था और प्रकृति का अनूठा संगम होता है।

Jaldevi Mata Temple sansera Relmangra

इतिहास : कहते है हल्ळीघाटी के बाद अकबर को न माल मिला न कंगूरे तो हैरान अकबर ने मेवाड़ का कूच किया। चार जगह चौकियां स्थापित की। मोही में स्थापित चौकी का मोर्चा खुद अकबर ने संभाला। कहते है इसी बीच बादशाह और उसकी फौज ने यहां डेरा डाला था। इस लिए सांसेरा के तालाब को आज भी बादशाह मंगरी कहा जाता है। ग्रामीण रामेश्वर लाल, मांगी लाल और मोती लाल ये दावा करते है कि यहां माली समाज की दो सतियां चित्तौड़ से यहां महाराणा प्रताप की रक्षा के लिए आधी रात को पीपल के रूप में पधारी। मंदिर वाली जगह का इशारा करते हुए ग्रामीण कहते है इसी जगह पर महाराणा प्रताप ने बादशाह की मूंछ और उसकी पत्नी हूरमा का चौटळा काटा था। इसके बाद अकबर ने कभी मेवाड़ का रूख नहीं किया था। यहां तालाब और उसके आसपास कई गुंबद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिलते है।

आस्था : यहां मां सास और बहू के रूप में बिराजमान है। छोटी नवरात्रि का यहां तीन दिन का मेला भरता है। मंदिर खुला होने से कोरोना काल में भी भक्तों का दर्शन होते रहे। कहते है यहां साल में एक बार पानी का दीपक जलता है। मां की महर ऐसी है कि अकाल में भी तालाब कभी सूखता नहीं है। ग्रामीण बताते है कि ये माली समाज की दो सतियां है जो महाराणा प्रताप के निवेदन पर आधी रात को सांसेरा आई।

प्रकृति : प्रकृति यहां खुद मेहरबान रहती है। 12 ही महीने हरियाली और पानी भरा रहता है। यहां कीर जाति के लोग सिंघाड़े, ककड़ी और तरबूजे-खरबूजे की खेती कर परिवार का पालन पोषण करते है। इस जगह के सिंघाडे़ काफी प्रसिद्ध है।

यहां कैसे आए : ये स्थान राजसमंद जिले के रेलमगरा में स्थित है। आप अगर उदयपुर से यहां आना चाहते है तो मावली, फतहनगर और दरीबा होकर आ सकते है। जबकि राजसमंद होकर आना चाहे तो रेलमगरा और दरीबा से सांसेरा आना होगा। इसके अलावा चित्तौड़गढ़ की तरफ से आने वालों को कपासन, भूपालसागर होते हुए दरीबा और फिर यहां आना होगा।

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