मैं दशरथ मांझी से काफी प्रभावित रहा हूं। जब जब मांझी मेरे दिमाग में आता है तब-तब मुझे एक नशा सा चढ़ जाता है। जो मांझी को नहीं जानते है उनको बता दूं कि वो पहाड़ तुड़वाइया जिस पर नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने फिल्म बनाई थी। क्या गजब का केरेक्टर निभाया यूं लगा कि पिछले जन्म में ई आदमी ही मांझी था। मांझी का एक डायलाॅग काफी याद आता है मुझे वो ये कि शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद।


लो हम फिर आ गए। तुमको क्या लगता था हम नहीं आएंगे। गलत।
तोड़ेगे नहीं जब तक छोड़ेंगे नहीं। शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद।


मैं सोचता था कि मांझी जैसा व्यक्ति इस पृथ्वी पर कोई जन्म ही नहीं सकता है। गलत सोचा था मैंने और आपने। एक शख्स जन्म गया है जिसका नाम है लौंगी भुइयां। महाशय की उम्र 70 साल के करीब है। इनकी खबर देखी तो दंग रह गया मैं कि इन्होंने बिहार के गया में एक जगह है नाम है लहथुआ क्षेत्र का कोठिलवा गांव। मांझी का गांव था गलहौर। वहीं गलहौर की गुड़िया, फगुनिया। खैर आपको ताज्जुब होगा कि कोठिलवा गांव में पानी की बड़ी किल्लत है।

लौंगी भुइयां ने तीस साल लगाए और पहाड़ियों के बीच से नहर निकाल दी वो भी सत्तर की उम्र में। हैरत तो तब होगा जब आप सुनोंगे कि इस शख्स ने पहाड़ी से तीन किमी लंबी नहर को खोद कर रास्ता दिखा दिया। यह बात लौंगी ने खुद एएनआई से बातचीत के दौरान बताई कि मैं पिछले 30 सालों से अपने मवेशियों को पालने और नहर की खुदाई करने के लिए पास के जंगल में जा रहा हूं। इस प्रयास में मेरे साथ कोई भी नहीं था। गांव वाले तो कमाने-धमाने शहर चल दिए और मैंने यही रहने का फैसला किया था। लौंगी भुइयां का ये गांव जिला मुख्यालय से करीब 80 किमी बताया जा रहा है।

उनका गांव घने जंगल और पहाड़ों से घिरा एक आशियाना है। उनका गांव माओवादियों के लिए भी मशहूर है। उनके गांव में एक परेशानी ये थी कि उनका गांव खेती और पशुपालन पर ही निर्भर है। जब बारिश होती है तो पानी पहाड़ों से सीधे नदी में चला जाता है। ऐसे में पानी उनके गांव में ठहर ही नहीं पाता है। यूं कहे बस स्टैंड नहीं होने की वजह से पानी एक्सप्रेस के माफिक नदी में चला जाता है। उन्होंने इसीलिए इस पानी का बस स्टैंड बनाया और इसके लिए उन्होंने पहाड़ से बगावत कर दी।