40 साल पहले गांव छोड़कर शहर आए, बुजुर्ग पिता की इच्छा थी गवरी का मंचन हो, बेटों ने पूरी की इच्छा

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उदयपुर शहर के सेक्टर 9 में रातभर उड़ी थाली-मांदल की झणकार, देखने उमड़ा सैलाब

उदयपुर। संस्कृति को बचाने का और बुजुर्गों की बात को मान-सम्मान देने का इससे बढिय़ा उदाहरण दूसरा कोई नहीं हो सकता है। दरअसल शहर में 40 साल पहले गांव छोडक़र आए एक बुजुर्ग की इच्छा थी कि वो अपने गांव की Gawari को शहर में खेलने का मौका दें। पिता की इस इच्छा को बेटों ने गांव से गवरी बुलाकर पूरी की। मंगलवार रात से बुधवार अलसुबह तक सेक्टर 9 में रात को गवरी का मंचन हुआ। देर रात तक शहर के कई इलाकों से आए आदिवासी कलाकारों ने लोगों का खूब मनोरंजन किया। इसके लिए कलाकार उदयपुर से 100 किमी दूर सायरा के ब्राह्मणों का कलवाणा से बुलाए गए थे। जो दक्षिणी राजस्थान की सबसे बड़ी गवरी मानी जाती है। बुधवार को भी दिनभर Gawari का आयोजन हुआ। इसके लिए नागदा परिवार ने करीब डेढ़ लाख रूपए खर्च किए हैं। शहर के सेक्टर 9 निवासी जगदीश नागदा ने बताया कि उनके पिता धूलीराम नागदा (90) की लंबे समय से शहर में गवरी करवाने की इच्छा थी। वे 40 साल पहले गांव छोडक़र शहर में आ गए थे तब से यहीं रह रहे है। इस बार उनके बेटों ने मिलकर गांव से Gawari को विशेष आमंत्रण देकर बुलाया। इसके लिए बकायदा धुलीराम नागदा और उनके बेटों ने गवरी के 150 से ज्यादा कलाकारों के लिए बस की व्यवस्था करवाई। सभी के लिए रहने के साथ विशेष भोजन परसादी का आयोजन भी रखा। धुलीराम के कुल चार बेटे गौरीशंकर, जगदीश और गुलाब है। उनके दोनों छोटे बेटे टेंट व्यवसाई हैं।


3 बजे तक चली Gawari, शहरवासी जमकर बैठै रहे


इस सीजन में पहली बार नाइट गवरी में लोग भी रात 10 बजे से 3 बजे तक जमकर बैठे रहे। अलग-अलग नाटक के मंचन ने सभी का मनोरंजन किया। लोग अपने छोटे बच्चों के साथ आए और उन्हें इस लोक नृत्य के बारे में बताया। बुजुगों के साथ ही महिलाएं भी Gawari देखने आई। गवरी नृत्य में भील समाज के युवाओं व बुजुर्गों ने Gawari नृत्य में अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया। गवरी के मंचन में कलाकारों द्वारा हिंदी, अंग्रेजी, मारवाड़ी व मेवाड़ी भाषा को कुछ इस अंदाज से बयां किया की सभी का मन मोह लिया। गवरी के मंचन में कलाकारों के द्वारा लोहार, कंजर, मीणा बंजारा का खेल व चित्तौड़ का किला तोडऩा आदि कई प्रसंगों पर कलाकारों के द्वारा प्रस्तुति दी गई।


संस्कृति से जुड़े बच्चे यही मूल भावना


धुलीराम के बेटे जगदीश नागदा ने बताया कि आज के दौर में सोशल मीडिया का काफी क्रेज है। बच्चे भी ऑनलाइन वीडियो को देखकर Gawari के बारे में पूछते है तो हमारे मन में इस आयोजन को बड़े स्तर पर करने की इच्छा बढ़ गई थी। इस गवरी को नई पीढ़ी को देखकर बेहद अच्छा लगा है, जो हमें सुकुन देने वाला है। नागदा ने बताया कि गवरी सिर्फ मनोरंजन का खेल नहीं है, बल्कि हमें आपसी भाईचारे और त्याग-तपस्या के बारे में सीख देता है। पिता के मन भी कई सालों से गवरी के आयोजन करवाने की बड़ी इच्छा थी, जो अब पूरी हो गई है। सभी भाइयों में इस बढक़र कोई खुशी नहीं हो सकती हैं।


गवरी 40 दिन की कठिन साधना, तप भी


मेवाड़ में रक्षाबंधन के एक दिन बाद से गवरी के आयोजन हो जाता है। यह प्रसिद्ध लोक नाट्य और नृत्य है, जो भील जाति द्वारा 40 दिनों तक किया जाता हैं। माता गोरज्या और शिव की अराधना के रूप में इसका आयोजन किया जाता है। गवरी में सभी 150 कलाकार पुरुष होते हैं, जिनमें कई महिलाओं का किरदार निभाते हैं। मान्यता है कि नृत्य करने से गौरज्या माता लड़ाई-झगड़े और दु:ख से छुटकारा दिलाती हैं। गवरी टीम का नेतृत्व कर रहे नवलराम गमेती ने बताया कि गवरी में हिस्सा लेने वाले कलाकारों के लिए बहुत कड़े नियम होते हैं। जो गवरी करते हैं, वे 40 दिन तक नहीं नहाते हैं। हरी सब्जियां और मांस-मदिरा का त्याग कर दिन में सिर्फ एक बार ही खाना खाते हैं। नंगे पांव रहने के साथ ही सवा महीने तक अपने घर ना जाकर मंदिर में रहते हैं। जमीन पर सोते हैं। इसमें दो दर्जन से ज्यादा बाल कलाकार भी होते हैं।

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