अंतरराष्ट्रीय भूगोल कांफ्रेंस का दूसरा दिन

उदयपुर।अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक यूनियन एवं मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के साझे में अंतरराष्ट्रीय भूगोल कांफ्रेंस के दूसरे दिन शनिवार को 4 तकनीकी सत्र एवं 4 कमीशन हुए । आयोजन अध्यक्ष प्रोफेसर साधना कोठारी ने बताया कॉन्फ्रेंस में पर्यटन भूगोल एवं जल अस्तित्व का मूल विषयों पर कमीशन में अमेरिका, जापान , न्यूजीलैंड , कनाडा और भारत के विशेषज्ञ ने चर्चा की। पर्यटन भूगोल के कमीशन में बोलते हुए वाकायामा विश्वविद्यालय जापान के प्रोफेसर जोसफ एम चीयर ने कहा कि पर्यटन का विकास सतत होना चाहिए। इसकी अप्रोच एकीकृत, संपूर्ण एवं समग्र होनी चाहिए तभी पर्यावरण एवं विकास का संतुलन समुचित हो सकता है। वहीं भविष्य की पृथ्वी अंतरराष्ट्रीय भूगोल संघ का सबसे प्रतिष्ठित कमीशन है जिसमें आने वाली पृथ्वी के बारे में शोध किया जाता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय भूगोल यूनियन के महासचिव कोषाध्यक्ष तथा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के भूगोल विभाग के प्रोफेसर आरबी सिंह ने बताया कि भविष्य की पृथ्वी की रचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें पृथ्वी के संसाधनों का दोहन संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए। विकासवादी दुनिया में संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। भविष्य की पृथ्वी और भविष्य की पीढ़ी को बचाना है तो इस दोहन को रोकना होगा और वैश्विक से स्थानीय स्तर तक सतत पोषपीयता को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना होगा। कैंटरबरी विश्वविद्यालय न्यूजीलैंड के मिशेल हॉल ने कहा कि पर्यावरण और पर्यटन एक इंटर डिसीप्लिनरी विषय हैं। पर्यावरण को पर्यटन के द्वारा सतत विकास की ओर बढ़ाया जा सकता है।


सुविवि और टोरंटो विश्वविद्यालय कनाडा के “जल अस्तित्व का मूल” विषय पर आयोजित सत्र में जल की महत्ता के बारे में मंथन हुआ जिसमें जल संरक्षण कैसे किया जाए, क्या तरीके अपनाए जाए और आने वाले जल संकट को किस तरीके से जल का संरक्षण किया जाए। इसमें टोरंटो विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र एम हेरनान एल बियांची बेंगुरिया ने भी अपने विचार साझा किए।
प्रवासी पक्षी विशेषज्ञ डॉ देवराज ने कहा कि प्रवासी पक्षियों का पर्यावरण के अंदर अमूल्य योगदान है लेकिन आज के विकास के दौर में हम इसे कम आंकते जा रहे हैं जो कि पर्यावरण और मानव के लिए खतरे का निशान इंगित कर रहा है। पर्यावरण के अंदर जैविक और अजैविक तत्वों पर ध्यान देने की जरूरत है।
कनाडा की मनितोबा विन्निपेग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन सिंक्लेयर ने कहा कि जैव विविधता का जो वर्तमान समय में विदोहन हो रहा है हम सब के लिए चिंता का विषय है। अगर हम भावी पृथ्वी को बचाना है तो हमें संपोषणीयता का विकास करना होगा जिससे वर्तमान पीढ़ी और भविष्य की पीढ़ियों में सामंजस्य स्थापित करना होगा ताकि उसका संतुलित मानव पर्यावरण संबंध बना रहे।
आयोजन सचिव डॉ.भंवर विश्वेंद्र राज सिंह ने बताया कि 4 तकनीकी सत्रों में 50 रिसर्च पेपर्स का वाचन किया गया। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने इन शोध पत्रों में सतत पोषणीय विकास, प्राकृतिक संसाधन प्रबंध, वैश्विक से स्थानीय सतत विकास एवं सतत विकास की चुनौतियों के बारे में मंथन किया गया।
तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता और मॉडरेटर प्रोफ़ेसर पीआर व्यास, डॉ देवेंद्र सिंह चौहान, डॉ सर्बिया खान, डॉ विजय सिंह मीणा, डाॅ. ललित सिंह झाला, उर्मी शर्मा आदि शिक्षकों ने की।