लता मंगेशकर पर मेरा बहुचर्चित लेख : मुकेश_गर्ग

महान गायिका लता मंगेशकर आज 90 वर्ष की हो गईं। जब उन्हें 1990 में दादा साहब फालके एवॉर्ड से नवाज़ा गया तो नवभारत टाइम्स के लिए मैंने एक लंबा लेख लिखा था। लेख तो छप गया लेकिन प्रेस की भूल से उसमें मेरा नाम जाने से रह गया। बाद में भूल-सुधार की सूचना छापी गई। यही लेख हाथरस की ‘संगीत’ पत्रिका के सितंबर 1990 अंक में पुन:प्रकाशित हुआ।

तीस बरस के इस अंतराल में लता मंगेशकर पर ढेरों सामग्री प्रकाशित हो चुकी है। पर मेरी जानकारी के अनुसार अभी तक हिन्दी या अँगरेज़ी में एक भी ऐसी किताब या लेख सामने नहीं आया जिसमें व्यापक रूप से लता मंगेशकर के सांगीतिक गुणों की गहरी सांगीतिक व्याख्या की कोशिश की गई हो। तीस साल पहले लिखा गया मेरा यह लेख इस मामले में आज भी विनम्रतापूर्वक अकेला खड़ा है।

इस के महत्त्व को देखते हुए यत्किंचित् सुधार के साथ लता मंगेशकर के जन्मदिवस पर इसे साझा करते हुए मैं ख़ुश हूँ। ‘संगीत’ पत्रिका में प्रकाशित इसी लेख के फ़ोटो भी संलग्न कर रहा हूँ। पढ़ते वक़्त ध्यान रहे यह लेख तीस साल पहले लिखा गया था। तब तक लता मंगेशकर भारतरत्न से अलंकृत नहीं हुई थीं। – मुकेश गर्ग]

संगीत का समन्दर हैं लता मंगेशकर

लता, लता, लता। जहाँ देखिए, जिस अख़बार, जिस पत्रिका को उठाइए लता का मुस्कराता चेहरा और लता की ही चर्चा। कोई आवाज़ के गुण गा रहा है तो कोई उनकी शुरुआती जद्दो-जहद का बखान कर रहा है। किसी को गीतों के आँकड़ों में मज़ा आ रहा है तो कोई उनके मर्म-भेदी गीतों की स्मृतियों में ग़ोते लगा रहा है। लेख पर लेख चले आ रहे हैं। पर लता मंगेशकर हैं कि क़ाबू में नहीं आतीं। जितना कह लो, उतना ही अनकहा रह जाता है। एक समंदर हैं वो। ऐसा समंदर जिस पर पुल बाँधने की लाख कोशिश की जाए, नाकामी लगभग तय है।

क़रीब डेढ़ साल से वह चर्चा के केंद्र में हैं। पहले उन्हें संगीत-नाटक-अकादमी की फैलोशिप मिली। फिर पिछले सितम्बर में उनकी साठवीं सालगिरह मनाई गई। हाल ही में सरकार ने दादा साहब फालके अवार्ड से उन्हें सम्मानित किया है।

संगीत नाटक अकादमी की फ़ैलोशिप जब उन्हें मिली तो शास्त्रीय संगीत के पक्षधर कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा। दिल्ली की एक जानी-मानी सरोद-वादिका ने मुझे फ़ोन किया और प्रतिक्रिया जाननी चाही। इस उम्मीद में कि शायद इसपर मैं भी नाख़ुशी ज़ाहिर करूँ। लेकिन मेरा कुछ अलग रुख़ देख उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा— “यह फ़ैलोशिप शास्त्रीय संगीत के प्रोत्साहन के लिए शुरू की गई थी, फ़िल्मी गायकों के लिए नहीं।” और कि “लता मंगेशकर हैं ही क्या? वो तो कहिए भगवान ने उन्हें आवाज़ अच्छी दे दी है।”

कुछ दिन बाद फिर एक घटना घटी। जब सितार-नवाज़ उ.मुश्ताक़ अली का देहावसान हुआ और उन्हें श्रद्धांजलि देने दिल्ली में शोक-सभा जुड़ी तो दिल्ली के ही एक मशहूर रुद्रवीणा-वादक ख़ाँ साहब ने अपने शोक-उद्गारों में लता मंगेशकर को भी घसीट डाला। बोले— “जाने क्या हो गया है हमारी सरकार के दिमाग़ को! जो सम्मान वह अली अकबर ख़ाँ जैसे उस्ताद को देती है, उसी से लता मंगेशकर को नवाज़ डालती है!”

ऐसे फ़िक़रे बीसियों बरस से सुनाई पड़ते रहे हैं। इन्हें कहने वाले ज़्यादातर वे लोग होते हैं, जिन्हें रागदारी संगीत का दंभ है। जिनके लिए ऊँचे संगीत का मतलब है सिर्फ़ शास्त्रीय संगीत। लोक-संगीत, सुगम संगीत या फ़िल्म-संगीत कान में भी पड़ जाए तो इनकी इज़्ज़त को बट्टा लगता है। प्रशंसा तो दूर, इन्हें वे हिक़ारत की नज़र से देखते हैं। किसानों-मज़दूरों और रिक्शे-ताँगेवालों को रिझा लेनेवाला संगीत इन्हें अच्छा लगे भी तो कैसे?

सुख की बात है ऐसे लोग उँगलियों पर गिनने लायक़ हैं। पक्के गाने-बजाने वालों में उन लोगों की तादाद कहीं ज़्यादा है जो लता मंगेशकर की कला से अभिभूत हैं। उसकी तारीफ़ करते नहीं अघाते। “हमें तो ग़ुलाम बना लिया है सा’ब लता ने” — कहना है खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति और प्रसिद्ध गायक डॉ. एम. आर. गौतम का — “क्या कंट्रोल है। कितनी मुश्क़िल चीज़, लेकिन क्या मज़ाल कि इधर से उधर हो जाए। हम सोचते कि अबकी तो ज़रूर फ़िसलेगी। मगर नहीं, वैसा का वैसा गा गई, हर बार उसी दरजे का…और कैसी फ़ीलिंग…उफ़।”

पंजाबी ठुमरी के बादशाह स्व. बड़े ग़ुलामअली खाँ लता की आवाज़ के मुरीद थे। एक रोज़ घर पर किसी शागिर्द को तालीम दे रहे थे। इतने में पड़ोस का लाउडस्पीकार बोल उठा।लता का गाना था। खाँ साहब क्षण-भर ख़ामोश रहे। फिर बोले— “देखो बेटा, सुर इसे कहते हैं।” जयपुर घराने के उ० अल्लादिया ख़ाँ के नामी बेटे उ० भूर्जी ख़ाँ को घर पर लोगों ने कितनी ही बार लता का रिकॉर्ड लगाए आत्म-विभोर दशा में बैठे देखा था। ग़ज़ल और ठुमरी-दादरा की रानी बेगम अख़्तर भी लता की आवाज़ की बड़ी क़द्र करती थीं। एक रोज़ आधी रात को संगीत-निर्देशक मदन मोहन को उन्होंने नींद से जगाया और एक गाना फ़ोन पर ही सुनवाने का आग्रह करने लगीं। यह गाना था ‘कदर जाने ना…’ (भाई-भाई)।

संगीत-निर्देशक के रूप में पं० रवि शंकर की अमर पहचान बनानेवाले गीत फ़िल्म ‘अनुराधा’ के लिए लता ने ही गाए थे। 1979 में बनी फ़िल्म ‘मीरा’ में गाने के लिए लता ने जब इनकार कर दिया तो पंडितजी दुविधा में पड़ गए थे। बाद में वाणी जयराम से उन्हें गवाना पड़ा। काफ़ी मेहनत के बावजूद गीतों में वह बात पैदा न हो सकी। लता की कला रवि शंकर के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण रही है, इससे ज़ाहिर है।

पं० कुमार गंधर्व ने तो लता मंगेशकर के ऊपर एक लम्बा लेख ही लिख डाला था। लता की गायकी और उनकी समझ का इतना बारीक़ विश्लेषण पहली बार हुआ, वह भी कुमार जैसे शास्त्रीय संगीतज्ञ की क़लम से। रागदारी संगीत के किसी कलाकार ने शास्त्रीय गायकों-वादकों तक का ऐसा विश्लेषण कभी नहीं किया। कुमार ने लिखा था — “ऐसा कलाकार शताब्दियों में शायद एक ही पैदा होता है। ऐसा कलाकार आज हम-सबों के बीच है, उसे अपनी आँखों के सामने घूमता-फिरता देख पा रहे हैं। कितना बड़ा है हमारा भाग्य!!”

सचमुच हमारा भाग्य बहुत बड़ा है। ख़ासकर उस पीढ़ी का जिसने सन् पचास से सत्तर तक लता की गायकी को पग-पग बढ़ते देखा है। उस ज़माने में नई फ़िल्म के गाने रेडियो पर सुनने की होड़ लगी रहती थी। सबसे ज़्यादा कान रहते थे लता की आवाज़ पर। जिस फ़िल्म में उनका गाना न होता, समझो पिट गई। अगर एक गाना उन्होंने गाया तो सबसे ज़्यादा लोकप्रिय वही होता। लता के गानों की वजह से ऊलजलूल फ़िल्मों तक का बाज़ार चल पड़ता था। गीत सुनने के लिए बार-बार लोग टिकिट ख़रीदते और सिनेमा हॉल में जा बैठते। फ़िल्में दूसरे-तीसरे दरजे की, पर गाने ऐसे कि जी करे सुनते रहें और सुनते ही रहें।

लता मंगेशकर की उपेक्षा का सबसे बढ़िया तरीक़ा यह है कि उनकी आवाज़ की तारीफ़ कर दी जाए — “वो तो कहिए भगवान ने आवाज़ अच्छी दे दी, वरना…।” गोया ऐसी आवाज़ किसी और को मिल जाती तो वो भी लता मंगेशकर बन जाती। यह झूठ है, पाखंड है। या तो जान-बूझकर हम समझने की कोशिश नहीं कर रहे, या फिर कहना पड़ेगा कि हम में संगीत समझने की बुद्धि ही नहीं। एक गायिका के रूप में लता का तिरस्कार करनेवाला व्यक्ति सच्चा संगीतज्ञ कैसे हो सकता है, मेरी समझ में नहीं आता।

सच पूछा जाए तो लता मंगेशकर नाम है एक दिमाग़ का। ऐसा दिमाग़ जो पलक झपकते संगीतकार की कल्पना को समझ लेता है। न सिर्फ़ समझता है, बल्कि उसे कैसे सजाया-सँवारा जाए, इसपर तेज़ी से चिंतन करता है।

दम्भी शास्त्रीय संगीतज्ञ कह देते हैं कि “इसमें लता की अपनी कला क्या हुई? उसकी क्या ख़ूबी हुई? सारी बात तो म्यूज़िक डाइरेक्टर की धुन और ऑरकेस्ट्रेशन की है।” कितनी बेअक़्ली की बात है यह। ठीक है, वह जो-कुछ गाती हैं, दूसरों की रचनाएँ होती हैं। पर दूसरों की रचनाएँ तो अन्य गायिकाएँ भी गाती हैं। फिर लता मंगेशकर से उनमें आकाश-पाताल का फ़र्क़ क्यों नज़र आता है? ज़रा ध्यान दें तो बात समझ आएगी। एक-एक शब्द बल्कि शब्द का एक-एक अक्षर किस तरह उच्चरित होना चाहिए इसपर लता गम्भीरता से विचार करती हैं। स्वर को कहाँ खड़े रखना है, कहाँ ठोकर मारनी है, कहाँ दुलारना है, कहाँ मोतियों की लड़ी की तरह बिखेर देना है, कहाँ समंदरी लहरों के मानिंद एक पर दूसरे सुर को चढ़ाते चले जाना है, कहाँ सुर को फिसलाना है, कहाँ खोदना है, कहाँ रबर की डोरी से बँधी पानी भरी गेंद की तरह फैंक कर फिर अपनी ओर खींच लेना है, एक ही हरकत में कहाँ किस सुर को गौण और किसे उभार देना है, कहाँ सुर पर निश्चल खड़े रहना है, कहाँ कंपित कर देना है, किस सुर को पीटना है, किसे सहलाना है, कहाँ और कितने अनुपात में मुरकी लेनी है, कहाँ मुरकी उभारनी है, कहाँ उसे नामलूम हरकत बना देना है, सुर के उच्चार की शुरुआत कैसे हो और समाप्ति कैसे – इन सब पर लता का दिमाग़ कम्प्यूटर की तरह काम करता है। उनका चिंतन गीत में कुछ और ही बात पैदा कर देता है – संगीतकार की कल्पना से भी सुंदर। दूसरे की रचना को माँज देना, उसके कोने-कोने को आलोकित कर देना, उसकी रग-रग में धड़कन बसा देना कोई साधारण बात नहीं। कुछ गीतों या कुछ संगीतकारों की रचनाओं में ही नहीं, नौसिखिए से लेकर आला दरजे के दिमाग़ वाले हर कम्पोज़र की हर रचना में लता की ऐसी कारीगरी देखी जा सकती है।यह कोई मामूली सर्जनात्मकता नहीं। इसे तो अद्वितीय ही कहना पड़ता है।

संगीत के शास्त्र-ग्रंथों को उठा कर देखिए। गायक-गायिकाओं के जितने गुण बताए गाए हैं लता में मिलेंगे। मधुर कंठ, रागों का ज्ञान, मंद्र-मध्य-तार तीनों स्थानों में गमक लेने की क्षमता, इच्छित स्वर पर तुरंत पहुँचने का सामर्थ्य, ताल-लय की मर्मज्ञता, स्वर व श्रुतियों के स्थान की जानकारी, गाते में थकान का न होना, सभी प्रकार के काकु-प्रयोग में निपुणता, सभी स्थायों में संचार करने की क्षमता, रंजकता, स्वर-वर्ण-ताल को संयुक्त करके गाने की क्षमता, साँस का लम्बा होना, एक स्वर से दूसरे स्वर का सहज जुड़ते चले जाना, पहले न गाई हुई चीज़ को भी प्रत्युत्पन्नमति से गा देने की क्षमता इत्यादि जितने गुणों की चर्चा भरत मुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में मिलती है, लगभग सभी लता मंगेशकर में मौजूद हैं। भरत ने गायिका के सन्दर्भ में रूप-सौन्दर्य की चर्चा भी की है। लेकिन रूप-सौन्दर्य से भरत का जो अभिप्राय रहा होगा आज वह प्रासंगिक नहीं रह गया। भरत के ज़माने में गायिकाओं को नाटक में रंगमंच पर प्रत्यक्ष गाना पड़ता था। अगर तब प्ले-बैक सिंगिंग की तकनीक रही होती तो निश्चित ही भरत के लिए भी रूप-सौंदर्य का कोई अर्थ न रह गया होता।

स्वतंत्रता से पहले सहगल, ज़ोहराबाई, अमीरबाई का ज़माना था। लता और रफ़ी ने आकर आज़ाद भारत के फ़िल्म-संगीत का नक़्शा ही बदल डाला। यह ठीक है कि ज़माना किसी शख़्स के होने भर से नहीं बदलता। इसके लिए चाहिए ऐसा समाज जो अपनी ज़मीन तोड़ने पर आमादा हो। जो अपने कारणों से करवट बदल रहा हो। लता अगर सौ साल पहले हुई होतीं तो उनके होने और न होने में कोई फ़र्क़ ही न रहा होता।

आज़ादी के बाद जिस आशा, उत्साह और मेहनत से नया भारत बनाने का संकल्प जनता में दिखाई पड़ रहा था, उसका प्रभाव साहित्य, संगीत आदि तमाम कलाओं पर पड़ना लाज़िमी था। हर तरफ़ कुछ नया कर गुज़रने की ललक थी। कला के ज़रिए अपनी भावनाएँ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाकर कलाकार सुखी होता था। सिनेमा हालाँकि व्यावसायिक माध्यम था, पर सौभाग्य से संगीत-निर्देशकों के बीच व्यावसायिक स्पर्धा का स्तर इतना नहीं गिरा था कि कला के पैरों पर वे कुल्हाड़ी मारते। हर सफल संगीतकार बढ़िया से बढ़िया काम करने की कोशिश करता, नई से नई धुनें बनाता और भारतीय लोक-संगीत व शास्त्रीय संगीत की श्रेष्ठतम उपलब्धियों का सर्जनात्मक इस्तेमाल करता। आज़ादी के बाद क़रीब बीस साल तक यह दौर चलता रहा। इस दौर के ख़ज़ाने में नौशाद, एस० डी० बर्मन, सज्जाद हुसैन, सी. रामचन्द्र, शंकर-जयकिशन, रोशन, मदनमोहन, वसंत देसाई, हेमंत कुमार, हंसराज बहल, एन. दत्ता, दत्ताराम, आदिनारायण राव, एस० एन० त्रिपाठी से लेकर ओ० पी० नैयर, जयदेव, ख़य्याम, रवि, कल्याणजी-आनंदजी, उषा खन्ना और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल तक अनेक संगीतकारों द्वारा तराशे बेशुमार रत्न सुरक्षित हैं।

बदलाव के इस दौर में लता मंगेशकर जैसी शख़्सियत आ जाने से मानो चमत्कार फट पड़ा।ऑरकेस्ट्रा और माइक्रोफ़ोन के इस्तेमाल में तकनीकी निपुणता अपने रास्ते तरक़्क़ी कर ही रही थी। लता ने आकर गायकी के क्षितिज का विस्तार कर दिया। पैनी और पारदर्शी आवाज़, बड़ी रेन्ज और मुश्क़िल से मुश्क़िल चीज़ को कह देने की ताक़त ने रचनाकारों का नज़रिया ही बदल डाला। संगीतकार नए सिरे से सोचने को मजबूर हुए। नायिका के गीतों की धुनें अब लता को ध्यान में रखकर तैयार होने लगीं। शुरू में नूरजहाँ, ज़ोहराबाई- जैसी सरल धुनें लता को दी गईं। पर ज्यों-ज्यों उनके गले की बारीकियों का और धुन ग्रहण करने की उनकी विकट क्षमता का राज़ खुलता गया, धुनें जटिल से जटिलतर होती गईं। अदना-सा संगीतकार भी नए-नए प्रयोगों पर ध्यान देने लगा। शंकर-जयकिशन, मदनमोहन, रोशन जैसे संगीतकार ही नहीं, नौशाद जैसे पुराने संगीतकार की प्रतिभा भी आसमान नापने लगी। वरना ‘अँखिया मिलाके जिया भरमा के…’ (रतन/ज़ोहराबाई) और ‘आवाज़ दे कहाँ है…’ (अनमोल घड़ी/ नूरजहाँ और सुरेंद्र) जैसी सपाट धुनों के रचयिता के दिमाग़ में ‘मोहे भूल गए साँवरिया…’ (बैजू बावरा), ‘जो मैं जानती बिसरत हैं सैयाँ…’ (शबाब), ‘मोहे पनघट पे…’ (मुग़ल-ए- आज़म) और ‘ना मानूँ, ना मानूँ, ना मानूँ रे…’ (गंगा-जमना) जैसी आला दरजे की कारीगरी पेश करनेवाली धुनें कैसे आ सकती थीं?

पिछले चालीस बरसों से सुगम संगीत गानेवाली हर गायिका लता मंगेशकर बनने की कोशिश कर रही है। पर हासिल कर लेना तो दूर अभी तक लता को छूना भी मुमकिन नहीं हो पाया है। वजह साफ़ है। गायिकाएँ कई अच्छी हैं। मगर उनकी अच्छाई किसी एक दिशा में है। किसी के गले में कोई चीज़ सुघड़ लगती है तो किसी में कोई। हर चीज़ लाजवाब हो, यह लता ने ही करके दिखाया है।

लम्बे और कट-नोट्स दोनों के इस्तेमाल में लता को महारत हासिल है। लंबे सुरों के लिए ‘ओ बसंती पवन पागल…’ (जिस देश में गंगा बहती है) और कट-नोट्स के लिए ‘आनंद मठ’ का ‘वन्दे मातरम्’ गीत सबसे अच्छी मिसालें हैं। दमदार तान देखनी हो तो ‘सेहरा’ के ‘पंख होते तो उड़ आती रे’ गीत की शुरुआत सुननी चाहिए। यों ‘सीमा’ फ़िल्म के ‘मनमोहना बड़े झूठे’ गीत के आख़िर में भी लता ने तानबाज़ी का कम अच्छा नमूना पेश नहीं किया। सरगम की तानों के लिए ‘घायल हिरनिया…’ (मुनीम जी) गीत में स्थायी और अंतरे के बीच का हिस्सा सुनकर देखिए। मींड़ देखनी हो तो ‘रसिक बलमा…’ (चोरी-चोरी) में ‘बलमा’ शब्द की अदायगी देखनी चाहिए। बोलतान खोजनी हो तो इसी गीत के ‘दिल क्यूँ लगाया तू ने’ शब्दों के ‘याऽऽऽऽऽ तूऽनेऽ’ अंश पर ग़ौर फ़रमाएँ।

माना जाता है कि स्वतंत्रता के बाद हमारे वाद्यों की वादन-शैली पर गायन का बहुत असर पड़ा है। सितार, सरोद, बाँसुरी, वायलिन सभी पर। उधर वाद्यों ने भी गायन को ख़ूब प्रभावित किया है। ख़ास तौर से सितार ने। सितार का गले पर कैसा प्रभाव पड़ा, इसे समझने के लिए लता के गीतों से अच्छी मिसाल मिलना कठिन है। सितार की हरकतों, ज़मज़मों और छोटी-छोटी मींड़ों का काम देखने के लिए ‘ओ सजना, बरखा बहार आई’ (परख) और ‘मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है’ (पूजा के फूल) गीतों पर ध्यान दिया जा सकता है। फ़िल्म ‘अनुराधा’ के ‘हाए रे, वो दिन क्यूँ न आए…’ और ‘कैसे दिन बीते, कैसे बीतीं रतियाँ…’ गीतों में पं० रवि शंकर के सितार की कई हरकतें पकड़ी जा सकती हैं। इन गीतों में कभी-कभी तो लगता है गला सितार बन गया है। लता का कंठ बाँसुरी की आवाज़ का भी सहधर्मी है। ‘मैं पिया तेरी तू माने या न माने…’ (बसंत बहार) गीत में लता की आवाज़ और पन्नालाल घोष की बाँसुरी के बीच मानो एक होड़ लगी रहती है।

लता ने इतना गाया है, इतनी तरह का गाया है कि लगता है ऐसा कुछ नहीं, जिसे वह न गा सकें। बेशक़ वह मराठा हैं। पर जब बर्मन ‘दा उन्हें गवाते तो बंगाली मुहावरा गले में नाचने लगता। ‘खाई है रे हमने क़सम…’ (तलाश), ‘जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे…’ (बंदिनी), हौले-हौले जिया डोले…’ (कैसे कहूँ) जैसे ढेरों गीत इसकी गवाही देंगे। राजस्थानी, पंजाबी, ब्रज, भोजपुरी, मराठी, कन्नड़ ही नहीं, जापान जैसे देश की धुनों के मुहावरे तक को ज़रूरत के मुताबिक़ गाने में उतारने की उन्होंने कामयाब कोशिश की है। जिस अंचल का गीत वह गाती हैं, लगता है उसी धरती का हवा-पानी उनकी रगों में दौड़ रहा है।

लता की आवाज़ का धर्म कुछ ऐसा है और उनकी अदायगी कुछ ऐसी कि फूहड़ शब्दावली भी गरिमा से दीप्त हो उठती है। ‘तुम हमें प्यार करो या ना करो, हम तुम्हें प्यार किए जाएँगे…’ (कैसे कहूँ) गीत जब लता के कंठ से फूटता है तो किसी ढीठ, निर्लज्ज और ज़िद्दी लड़की की इमेज खड़ी नहीं करता। उस स्त्री को सामने ला खड़ा करता है, जिसकी मानवीयता और त्याग की विशाल प्रतिमा हमारे अनेक महाकवियों को भी काम्य रही है। उस कामातुर नायिका को सामने नहीं लाता जो बिहारी की नायिका की तरह ‘पावक झर-सी झमक’ कर पुरुष को लम्पट बन जाने को मजबूर कर देती है, उसे वासना की आग में जला डालती है। ज़रा कल्पना कीजिए ‘प्यार किया तो डरना क्या…’ (मुग़ल-ए-आज़म) गीत शमशाद बेगम या मुबारक बेगम ने गा दिया होता तो क्या हश्र हुआ होता? वैसी शालीनता और गम्भीरता क्या उसे मिल पाती?

अपनी दुर्दम्य प्रतिभा से लता ने पैसे-टके की मुहताज और नफ़ा-नुक़सान से जुड़ी कला को भी क्लासिकी ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। सदियों से शोषित नारी इस पुरुष-प्रधान समाज में इन बुलंदियों पर पहुँचे, न सिर्फ़ पहुँचे, बल्कि चालीस से ज़्यादा साल तक साम्राज्ञी की तरह राज करे और करोड़ों लोगों के दिलों की धड़कन बन अखंड सम्मान पाती रहे, यह सिर्फ़ लता को नसीब हुआ है। फ़ैलोशिप, पद्मविभूषण, फालके सब उनके सामने बौने लगते हैं। वह हैं तो बस ‘भारत-रत्न’।

मुकेश_गर्ग

नवभारत टाइम्स / 1990