इस आर्टिकल को हम बाई के जीवन और संस्मरण को लेकर स्व लक्ष्मीलाल जी जोशी के संपादन में लिखी गई पुस्तक महात्मा श्री भूरीबाई अलख में लिखे हुए लेख की काॅपी कर रहे है। इसमें लिखा हुआ एक शब्द भी हमारा नहीं है। इसकी वजह ये है कि भूरी बाई के बारे में बहुत कम लोग जानते है। जो जानते है वो भी तथ्यात्मक जानकारियां नहीं जानते है। हमारी टीम THE UDAIPUR UPDATES आपको भूरी बाई के जीवन की सटीक और तथ्यात्मक जानकारी इस लेख में उपलब्ध करवा रहा है। जैसे भूरी बाई कौन थी, भूरी बाई को अलख नाम किसने दिया, भूरी बाई का जीवन किस प्रकार से गुजरा, भूरी बाई किन-किन संतों से मिली, भूरी बाई का संबंध मेवाड़ राजघराने से किस वजह से रहा आदि। तो चलिए बिना समय गवाए ही चलते है पुस्तक श्री भूरी बाई अलख के पृष्ठ नंबर 20 पर पूज्या भूरी बाईई: संक्षिप्त जीवन-वृत्त। ये पुस्तक का सांतवां संस्करण है…

पूज्या भूरी बाई का जन्म सरदारगढ़, मेवाड़ में संवत् 1949 को आषाढ़ शुक्ला 14 के दिन हुआ। इनके पिता का नाम रूपाजी सुथार व माताजी का नाम केसर बाई था। रूपाजी अत्यंत कुशल कारीगर थे और बड़े ही सात्विक, धर्मात्मा और बुद्धिमानी होने से उनकी समाज में और तत्काजीन ठिकाने सरदारगढ़ में बड़ी प्रतिष्ठा थी। माताजी बड़े ईश्वर भक्त और पुण्यात्मा थे। दयालु इतने थे कि एक दिन उनके मकान में एक चोर घुस गया व उनके घर के लोगों के जग जाने से उसे खाली हाथ भाग जाना पड़ा जिसका भी उसको रंज हुआ। उन्होंने कहा कि भरे घर में से बचारा यों का यों ही चला गया। सीढ़ियों पर रखे हुए कुछ बर्तन ही ले जाता तो उसके काम आते।
बाई भी बचपन से ही दयालु और धर्म प्रिय थे। संवत् 1956 के अकाल में पास-पड़ौस के बच्चे जो भूखे होते उनको घर से जाकर रोटी खिला देते थे और मवेशियों के साथ बहुत दया और स्नेह का बर्ताव रखते थे। इनका यह स्वभाव आजीवन रहा। इनके घर के मवेषी बाई के हाथ का कोमल स्पर्श और दिया हुआ चारा-दाना प्राप्त करने के लिए सदा उत्सुक रहते थे और उनको देखकर प्रेमपूर्वक रंभाते थे।

मेवाड़ की दूसरी मीरा मानी जाने वाली संत शिरोमणि भूरी बाई


तेरह वर्ष की आयु में बाई का विवाह नाथद्वारा के एक धनी चित्रकार फतहलालजी सुथार के साथ कर दिया गया। जिनकी आयु उस समय 43 बरस की थी। उनकी पहली पत्नी का स्वर्गवास हो चुका था और कोई संतान नहीं थी। छोटे गांवों के सुथार लड़कों को बाई जैसी सुंदर शरीर वाली लड़की के योग्य नहीं समझा गया क्योंकि उनके घरों में लकड़ी का या खेती का ही काम होता था। उन दिनों बेमेल विवाह को इतना अनुचित भी नहीं माना जाता था परंतु विवाह के दो-तीन बरस बाद ही फतहलालजी को श्वास का रोग हो गया जो बहुत इलाज कराने पर भी बढ़ता गया। पति की बीमारी असाध्य प्रतीत होने से बाई का चित्त अत्यंत खिन्न रहने लगा।
उन दिनों जब एक बार बाई सरदारगढ़ गए हुए थे वहां देवगढ़ की एक मुसलमान योगिनी नूरी बाई का आगमन हुआ, बाई उनके संपर्क में आए। नूरी बाई ने उनकी गहरी उदासी भांपकर उनका कारण जानने का प्रयत्न किया। उनके अधिक पूछने पर बाई ने अपने पति की बीमारी का हाल बता दिया। उस योगिनी ने बाई की स्थिति पर विचार कर यह उपदेश दिया कि ईश्वर की इच्छा होगी सो होगा।


पति की सेवा तो अच्छी तरह करती रहो परंतु इस बात का पूरा ख्याल रखना कि तुम्हारे कोई संतान न हो जावें। नाथद्वारा में घर के काम व पति की सेवा से निवृत्त होने पर अभ्यास भी करने लग गए। उनका शरीर बहुत स्वस्थ था जिसे निर्बल करने के लिए उनकी थाली में जो कुछ भी बच जाता उसी को खा-पीकर दिन निकालने लगे। इससे कभी-कभी तो उनके पूर्णतया निराहार रह जाने की भी नौबत आती रही। पति के इलाज में बाई ने किसी प्रकार की कसर नहीं रखी। पैसे को पानी की तरह बहाकर जो भी औषधि बताई जाती उसका सेवन कराया और दान-पुण्य भी करते रहे। बाई के जेठ खेमराजजी भाई के साथ अधिक स्नेह हो जाने के कारण अपने पुत्रों के होशियार हो जाने पर भी उनके साथ न रहकर फतहलाल जी के साथ ही रहते रहे। उन्हें भोजन की विविध वस्तुएं अच्छी बनाने का बहुत अनुभव था जो वे बाई को सिखाते रहे। सात्विक संस्कारों और पूर्ण मनोयोग के साथ काम करने के कारण बाई के हाथ का बना हुआ भोजन कितना स्वादिष्ट एवं भारी होने पर भी सात्विक एवं सुपाच्य होता था, उनका प्रसाद पाने वाले सभी भक्त एवं अतिथिगण कभी भूल नहीं सकते।अतिथियों एवं साथ रहने वालों को अच्छा भोजन खिलाने का शौक बाई को अंत तक रहा। रसोई में अपने हाथ से खास-खास काम करते रहना उन्होंने शरीर त्यागने से केवल पंद्रह दिन पहले निर्बलता बढ़ जाने पर ही छोड़ा था।

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बाई की उदारता और दानशीलता बचपन से लेकर अंत समय तक बराबर बनी रही। पति के समृद्ध घर की अधिकांश वस्तुएं जरूरतमंद लोगों को दे देकर घर को साफ ही कर दिया। उनके जेठ एक बार उनके लिए फतहलालजी एवं स्वयं के ओढ़ने के लिए अच्छी शाॅल लेकर आए थे। परंतु कुछ ही दिन बाद एक मेहतरानी को ठंड में ठिठुरती देख बाई ने अपना शाॅल उसे दे दिया। उनके पुत्र अपनी संभावित विरास का ह्रास होते देख अप्रसन्न होते थे। बाई की अंतिम बीमारी के वर्ष में एक संन्यासी आया और भोजन के उपरांत उत्तराखंड में यात्रा जाने की तैयारी के लिए एक कंबल मांगा। बाई के पास कोई कंबल नहीं था और नया खरीदवाकर देने के लिए उस समय रूपया भी नहीं था। बाई ने उनके भतीजे खूबीराम जी से उनका कंबल संन्यासी को दिलावा दिया और कुछ समय बाद उनको नया खरीदवा दिया। किसी को भूखा देखते तो उसे जो भी हो सकता खाने के लिए दिलवाए बिना नहीं रहा जाता था। कहा करते थे कि उन्होंने बहुत भूख काटी है जिसका दुख वे ही जानते हैं। फतहलालजी का सभी संभव इलाज कराने पर भी उनकी हालत दिन-दिन गिरती गई। जब वे अधिक निर्बल हो गए तो बाई ने बिछौना बिछाकर सोना छोड़ दिया। उसके पास ही दीवार के सहारे बैठे-बैठे ऊंघ लेते थे और उनकी सेवा के लिए तत्पर रहते थे क्योंकि किसी भी अन्य व्यक्ति का सहयोग उनकी सेवा करने में नहीं मिलता था।

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पति के स्वर्गवास के समय बाई की आयु 26 वर्ष की थी। उस समय घर की सब चल-अचल संपत्ति या तो इलाज में या दानपुण्य में समाप्त हो चुकी थी।
नाथद्वारा में आए हुए एक युवा योगाभ्यासी संन्यासी से बाई ने भस्रिका प्राणायाम आदि क्रियाएं भी सीखी। भोजन और निद्रा पर कठोर संयम रखते थे और मन कभी किसी वस्तु का स्वाद स्मरण कर लेता तो उसको कठोर दंड देकर सीधा कर देते थे। इसी समय बाई को मालूम हुआ कि उदयपुर राज परिवार के महाराज साहब चतुर सिंह जी बहुत बड़े योगी हैं जिन्हें आत्म साक्षात्कार हो चुका है। उनका दर्शन और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए बाई उदयपुर पधारे। महाराज साहब ने बाई की योग में प्रगति का विवरण सुनकर फरमाया कि अभ्यास कर लिया है यह ठीक है लेकिन ज्ञान की कमी है। बाई को यह टिप्पणी पहले तो अप्रिय लगी किंतु महाराज साहब ने अपना संग्रहीत व लिखित कुछ साहित्य पढ़ने के लिए दिया तब उसके स्वाध्याय से महाराज साहब के वचनों का मर्ग समझ में आने लगा तथा महाराज साहब बहुत प्रसन्न्ा हुए। अपनी अंतिम बीमारी के दिनों शिवरती और करजाली महाराज साहब को जो उनके बड़े भाई थे व उनके सुपुत्रों को यह निर्दश दिया कि उनके देवलोक पधारने पर बाई को वैसे ही मानें जैसे कि महाराज साहब को मानते रहे थे। दोनों ठिकाने वालों ने महाराज साहब चतुर सिंह जी के इस उपदेश का पूरी तरह पालन किया और बाई के पास बराबर जाना व यथासंभव सेवा करना जारी रखा। करजाली महाराज साहब लक्ष्मण सिंह जी प्रति मास नाथद्वारा या सरदारगढ़ जहां भी बाई विराजते पधार जाते और महात्मा भाव से बर्ताव रखते थे। शिवरती महाराज साहब बाई की सेवा माता के भाव से करते थे और कई दिनों के पास रह जाते थे।

बाई के बिराजने के लिए नई हवेली वाले पुराने मकान में कुछ कष्ट होने से कुम्हारवाड़े में जमीन खरीदकर नया मकान भी बनवा दिया था जिसका विशेष विवरण बाई के संस्मरणों में हैं। आत्मज्ञान सन् 1928 के करीब हो जाने के बाद बाई ने लोगों से मिलना-जुलना जो अब तक कठोरतापूर्वक नियंत्रित कर था उसमें धीरे-धीेरे ढील देना प्रारंभ कर दिया। इससे उनके ज्ञान और वैराग्य की ख्याति फैलने लगी और अनेक जिज्ञासु एवं सत्संगी लोग उनसे मिलने के लिए आने लगे। बाई ने अपने पति के जिस मकान में रहकर योग साधना की थी उसका वायुमंडल ही इतना शांतिप्रद हो गया था कि जो भी व्यक्ति उनसे मिलने जाता उसे उस शांति का अनुभव हुए बिना नहीं रहता था। व्यर्थ की बातचीत तो वहां हो ही नहीं पाती थी। बाई ने बैठने के स्थानों पर चुप लिखवा रखा था। हरे रंग के कांच से बना कर दीवार में लगाए इन अक्षरों का प्रभाव और घर का वातावरण सभी आगंतुकों को सहज ही प्रभावित कर देता था। बाई का अध्ययन भी इस बीच काफी बढ़ गया था। कोई साधन प्रश्न करता तो बाई स्वयं उसका उत्तर न देकर उसको वह पुस्तक और उसका संबंधित अध्याय बताकर पढ़ने का निर्देश दे देते थे कि जिससे उस प्रश्न का उत्तर उसे बिना बातचीत के मिल जावें। फिर भी कभी-कभी बाई स्वयं भी उसको स्पष्ट करने के लिए कुछ वाक्य फरमा देते थे। अपने को विद्वान मानने वाले महाशयों को बाई समर्थ गुरु रामदास का दासबोध पढ़ने के लिए देते थे। अधिक पढ़े-लिखे साधकों से बाई उपनिषद् और वेदांत, सांख्य, योग्य आदि के हिंदी ग्रंथ, उनके भाष्य, संत साहित्य, महर्षि रमण, समर्थ गुरु रामदास, संत ज्ञानेश्वर, रामकृष्ण परमहंस के वचनामृत, अष्टावक्र गीता आदि पढ़वा कर सुनते रहते थे। अष्टावक्र गीता सुनना बाई को बहुत पसंद था।

भजन-कीर्तन में पास-पड़ौस की स्त्रियां और पुरुष तो आते ही थे पर कभी-कभी नाथद्वारा की दो मेहतरानियां भी आया करती थी। उनके गाए हुए निर्गुणी भजन बाई अन्य महिलाओं को याद करा देते थे जो उनकी अनुपस्थिति में भी गाए जाते थे। जीवन के अंतिम दिनों तक रामचरित मानस के सुंदरकांड का पाठ बाई स्वयं करते रहे। सुबह और तीसरे पहर के समय बाई के दर्शन एवं भजन-कीर्तन के लिए आने वालों को बाई के यहां चाय पीना अनिवार्य सा था। बाई की ख्याति बढ़ने के साथ-साथ उनके पास सत्संग की कामना से और संत के दर्शनमात्र से पुण्यलाभ करने की लालसा से लोगों का आना भी बढ़ता रहा। वे किसी का भूखा रहना सहन नहीं कर पाते थे। खर्च अधिक होने की बाई को रत्ती भर भी चिंता नहीं करती थी। कर्ज बढ़ने पर भगवद् प्रेरणा से कोई एक दो सज्जन ही ऐसे ही आकर इतनी राशि भेंटकर जाते थे कि सारा कर्ज साफ हो जाता था। ऐसे सज्जनों में सन् 1967 के पहले इंजीनियर मीठालालजी भेंटर कर जाते थे। इसी में से बाई निर्धन एवं अनाथ महिलाओं व परिवारों की सहायता इतने गुप्त रूप से करते रहते थे कि किसी को नीचा न देखना पड़े। अपनी सेवा करने वाली महिलाओं में से भी जो आर्थिक सहायता की पात्र होती उनको भोजन, वस्त्र आदि प्रदान करते रहते थे। साधु-संतों की सेवा और आतिथ्य तो उच्च कोेटि का होता ही रहता था। बाई के संपर्क से अनेक स्त्री-पुरुषों के जीवन वर्णनातीत सुधार होता रहा।

सबसे पहले भाई नाथूलालजी जोशी बाई के पास आने लगे। वे नाथद्वारा में श्रीकृष्ण भंडार में लेखा विभाग में नौकरी करते थे और रहन-सहन एक छैले जैसा था। परंतु बाई ने उनमें भक्त बन जाने की संभावना को पहचान लिया और संभावित बदनामी की परवाह न कर उनको आते रहने की आज्ञा दे दी। धीरे-धीरे उनका जीवन क्रम सर्वथा बदल गया और वे रात-दिन बाई की शरण में ही निवास करने लगे। परंतु बाई उनका संपूर्ण वेतन उनके परिवार वालों को ही दिलवाते रहे। नाथूलालजी भाई भजन-कीर्तन में कुशल थे और कीर्तन के दैनिक कार्यक्रम के मुखिया थे। उनका हृदय अत्यंत पवित्र और व्यवहार अत्यंत स्नेहपूर्ण था। सन् 1967 के प्रारंभ में जब बाई पुष्कर बिराजते थे, उनका नाथद्वारा में हृदय की गति रूकने से स्वर्गवास हो गया। नाथूलालजी के संपर्क में आने के कुछ समय बाद ही बाई के साधनकाल में ही भाई घासीरामजी मिस्त्री, उदयपुर वाले भी बाई के संपर्क में आ गए और आवागमन बढ़ते-बढ़ते के मुख्य पुरुष सेवकों में परिगणित हो गए। अंतिम समय तक उन्होंने बाई की सेवा रात-दिन दत्तचित्त होकर की। घासीरामजी के बाद भाई कालीदास जी भाटिया, नाथद्वारा वाले बाई के संपर्क में आए। वे वकालत कर रहे थे और अपनी प्रखर बृद्धि एवं निष्कपट व्यवहार के कारण वकालत में सफलता की ओर अग्रसर हो रहे थे। परंतु बाई के संपर्क में आने से अध्यात्म में रूचि हो गई और वकालत का काम शिथिल करते-करते छोड़ ही दिया। विवाहिता पत्नी का सर्वथा त्याग कर गृहस्थी से पूर्णरूप् से मुख मोड़ लिया और पूरे समय बाई की सेवा में रहते हुए ध्यान और जप आदि में समय व्यतीत करने लगे। आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन गहन रूप् से करते रहे। बाई के पुस्तकालय का संग्रह, संरक्षण और सदुपयोग कालीदासजी का विशिष्ट कार्य करता था क्योंकि बाई की रसोई और शारीरिक सेवा तो अधिकतर उनके संरक्षण में दिन रात रहने वाली महिलाएं फूलाबाई और गोदावरी बाई व बाद में टमू बाई करती थी। बाई के उपदेशों और शास्त्रों का सार समझकर कालीदासजी ने सुजाण बावनी नामक दोहों का संग्रह लिखा जिससे उनका गहन ज्ञान प्रकट होता है।

इस संग्रह का भी इस पुस्तक में समावेश किया जा रहा है। कालीदासजी ने सन् 1975 में 6 महीने बीमार रहकर शरीर छोड़ दिया। इस बीमारी में उनकी सेवा बाई ने स्वयं रात-दिन एक करते हुए बहुत अच्छी की। उनके स्वभाव में उग्रता जल्दी आ जाती थी जिससे बाई धैर्यपूर्वक सहन कर लेते थे। प्रथम तो पास रहने वालों का पुत्रवत् उनका स्वभाव ही था और कालीदासजी पर विशेष कृपा इस कारण रखते थे कि उन्होंने गृहस्थी का त्याग बड़ी वीरता और कठोरता के साथ निभाया था। बाई उनकी सेवा करते-करते इतने थक गए थे कि उनका स्वर्गवास होने पर स्वयं पाच माह तक बीमार रहे। इनके अतिरिक्त पूज्या बाई के पास समय-समय पर आने वालों में सन् 1937 से मेरा नाम, सन् 1955 के करीब सवाईसिंहजी चंूडावत व सन् 1955 से सरदारगढ़ कुंवर मानसिंहजी का व सन् 1960 के करीब से मीठालालजी माथुर, सहायक इंजीनियर सिंचाई का नाम आता है। सरदारगढ़ में कई वर्ष तक पिताजी की सेवा के लिए ठहरकर बाई सन् 1967 में वापस नाथद्वारा बिराजने लगे तब महाराणा साहब भगवत सिंह जी भी पधारने लगे। जयपुर निवासी कल्याणमल जी दड्डा का ससुराल नाथद्वारा में था वे भजन गाने में सिद्धहस्त थे। उनका सारा परिवार इसमें उनका साथ देता था। वे बाई के पास पधारकर कीर्तन सुनाया करते थे। छगनलालजी कुमावत भजनीक सन् 1976 से नित्य आकर भजन पार्टी के अगुआ बन गए जिसमें गीता बाई शर्मा, सायर बाई, भंवरी बाई आदि कई बहिनें उनका साथ देती रहीं व जब भी एकादशी, नवरात्रि और अधिक मास आदि अवसरों पर पूज्या बाई के चित्र के समुख भजन-कीर्तन करती हैं। इन सब को बाई का अगाध मातृ स्नेह प्राप्त हुआ।

  • अगले आर्टिकल में बताएंगे भूरी बाई का राम के प्रति अटूट स्नेह और कौन-कौन से धर्म, संप्रदाय और पंथ के संत-फकीर और लोग उनसे मिलने आते थे। ये भी बताएंगे कि ओशो किस प्रकार भूरी बाई का कायल रहा। अगर आप इसे ही आर्टिकल पढ़ना चाहते है तो प्लीज कमेंट करके हमें 7014091937 पर बताए। ताकि हम आपके लिए ला सके रोचक और चोचक वीडियो और आर्टिकल। आप हमारे the udaipur updates नाम से बनाए गए यूट्यूब चैनल को जरूर सबसक्राइब कर लें। लिंक नीचे दिया गया है।

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