नाथद्वारा शैली में बनी पिछवाई की विशेषता, गहराई से जानिए पिछवाई कला को

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नाथद्वारा से दरियाव सिंह

नाथद्वारा। पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय की प्रमुख प्रधान पीठ है नाथद्वारा। यहां की प्रत्येक सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में कभी आनंद छलकता है तो कभी भाव। यहां आनंद और भाव का जब मिलन होता है तो बनती है एक विशेष शैली, जिसे हम नाथद्वारा शैली कहते है। नाथद्वारा की शैली पूरी दुनिया में मशहूर है। इसी शैली का एक रूप में चित्रकला। नाथद्वारा में चित्रकला का अपना सौंदर्य और शृंगार अलग ही। आज हम इस लेख में आपको बताएंगे नाथद्वारा की पिछवाई कला के बारें में। ये भी बताएंगे पिछवाई कला किससे संबंधित है, पिछवाई कला किससे संबंधित है, पिछवाई चित्रकला कहां की प्रसिद्ध है, नाथद्वारा शैली की विशेषता क्या है, पिछवाई पेंटिंग की हिस्ट्री, नाथद्वारा पेंटिंग और चित्रकला की नाथद्वारा शैली के प्रमुख पात्र कौन-कौन से होते हैं। वैसे ये पूरी दुनिया में और खासकर राजस्थान में अनूठी चित्रकला है। तो आईये एक-एक कर के जानते है इसके बारें में।


पिछवाई किसे कहते है


पिछवाई शब्द का अर्थ है पीछे वाली जगह। अथार्त श्रीनाथजी स्वरूप के पीछे लगने वाली कपड़े पर बनी पेंटिंग को हम पिछवाई कहते है। जो उस दिन के महत्व को दर्शाती हैं। यानी साधारण भाषा में कहते तो पिछवाई धराने से उस दिन का भाव क्रिएट होता है। पिछवाई देखने मात्र से ये आभास हो जाता है कि आज भाव किस से संबंधित हैं। जैसे श्री कृष्ण की रासलीला सहित विभिन्न लीलाएं, गोवर्धन धारी अष्ट सखियों संघ कुंज लीला, महारास, ठाकुरानी तीज, होली, दीपावली, शरद पूर्णिमा एवं अलग-अलग त्योहारों के अनुरूप कलाकारों के द्वारा पिछवाई बनाई जाती है। श्रीनाथजी स्वरूप के पीछे लगाई जाती है इसीलिए इसे पिछवाई कहते हैं। अलग-अलग मौसमों का भी परछाइयों में सुंदर चित्रण मिलता है जिसे बारहमासी भी कहा जाता है।


पिछवाई बनाई कैसे जाती है


नाथद्वारा में आज भी पिछवाई तीन सौ वर्ष पूर्व की तकनीकी और विधि से बनाई जाती है। पिछवाई के आर्टिस्ट दिनेश शर्मा बताते है कि तकनीक के रूप में अध्ययन करें तो स्पष्ट होता है कि प्राय: सूती कपड़े पर ही पिछवाई की रचना की जाती है। इस कपड़े को विशेष पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है। इसके बाद एंगर पर लटका कर उसको भाव अनुरूप रंग दिया जाता है। पिछवाई में रंगों को कपड़े से घोटने के लिए एक घोटे का उपयोग किया जाता है जो सफेद हकीक के पत्थर से बना होता है।

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पिछवाई मेंं रंगों का उपयोग


पिछवाई में पत्थर और प्राकृतिक रंगों का उपयोग बरसों से हो रहा है। विषय वस्तु के अनुरूप सर्वप्रथम गेरू रंग व बारीक कलम की सहायता से रेखांकन का खाका बना लिया जाता है। पुष्ट भूमि में रंगों के भरने के बाद आकृतियों की देह तथा वस्त्र आदि को रंगाकित कर विभिन्न रंगों को आच्छादित किया जाता है। इसके बाद स्वर्ण रंग के प्रयोग से आभूषण व अलंकरण बनाए जाते है। अंत में गहरे रंग व तूलिका की सहायता से पक्की लिखाई की जाती हैं। पिछवाई में रंगों को टीकाऊ तथा चमक को बनाए रखने के लिए हकीक के पत्थर से पिछवाई की हल्की हल्की घिसाई की जाती है। मांग के अनुसार इसमें सोने व चांदी के रंगों का प्रयोग भी किया जाता है। महंगी पिछवाई में असली सोने व चांदी के काम की सजावट भी की जाती है।


ये है नाथद्वारा में पिछवाई के कलाकार


नाथद्वारा में पिछवाई चित्रण से जुड़े प्रमुख चित्रकारों का उल्लेख किया जाए तो घासीराम, रेवाशंकरजी, उस्ताद नरोत्तमनारायण, देवीलालजी, शंकर लाल, उस्ताद घनश्याम शर्मा, इंद्र शर्मा, द्वारकालाल जी, वि_ल लाल जी, भूरी लाल शर्मा, खूबीराम शर्मा, तुलसीदास शर्मा आदि मुख्य है। इन कलाकारों में से कई कलाकार राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्राप्त कर चुके है।


वर्तमान में स्थिति


वर्तमान में नाथद्वारा शैली में कार्य करने वाले गीने-चुने लोग ही बचे हैं। जिसमें मुख्य रूप से उस्ताद घनश्याम शर्मा, विष्णु शर्मा, रघुनंदन शर्मा, योगेश शर्मा, दिनेश शर्मा, अतुल शर्मा, देवेन्द्र जांगिड़ आदि।
तिलकायत परिवार का सहयोग : शर्मा
पिछवाई कला के जाने-माने आर्टिस्ट दिनेश शर्मा बताते है कि नाथद्वारा आर्ट कला स्कूल न होकर अपने आप में एक अलग ही आर्ट है जिसे यहां के तिलकायत परिवार ने भी खूब सहयोग कियाहै। आगे बढ़ाने के लिए यहां के कलाकारो को संरक्षण दिया और कलाकारों को हर सुविधा उपलब्ध कराई। नए-नए प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया। जिससे यहां के कलाकारों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान हासिल किया। बहुत से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार जीत कर नाथद्वारा का गौरव बढ़ाया।


पिछवाई के बारे में इनका कहना है


दिनेश शर्मा बताते है कि कुछ व्यापारी एवं बाहर के आट्र्स कला के खरीदारों को पिछवाई के नाम पर गुमराह करते है। पिछवाई बनाने का तरीका आज भी जो 300 सालों से चला आ रहा है उसी तरीके से बनाई जाती है। बहुत सी बार देखने को मिलता है कि आर्टिकल या डॉक्यूमेंट्री में गलत तरीका बता कर लोगों को गुमराह किया जाता है। मगर इस बार दी उदयपुर अपडेट्स की टीम ने एक सटीक डॉक्यूमेंट्री बनाई है जिसको देखकर आपको इसकी वास्तविकता का पता चलेगा। शर्मा बताते है कि पिछवाई बनाने का तरीका मायका पर या जमीन पर कपड़ा चिपका कर बनाते हुए दिखाया जाता है जो कि सरासर गलत है। ये तरीका बहुत ही गलत ढंग से पेश किया जाता है। जबकि ऑरिजनल पिछवाई आज भी लटका कर हेंकर पर बनाई जाती है और लगभग दो या तीन बार हकीक के पत्थर से बने गोटे से घुटाई की जाती है। जिस से कपड़े में लगे रंग कपड़े के अंदर तक एक जैसा हो जाता है। पुराने तरीके से बनाई गई पिछवाई की उम्र दो सौ तीन सौ साल तक होती है। जो आज भी मन्दिरों के अंदर सुरक्षित है। चिपका कर बनाई जाने वाली पिछवाई की उम्र ज्यादा नहीं होती है और वे कुछ ही दिनों में कपड़े से कलर निकलना शुरू कर देती है।


उस्ताद घनश्याम जी शर्मा से मिलिये


आइए अब हम आपको बताते है एक ऐसे कलाकार के बारे में जो असंभव इस कला को बचाने का प्रयास कर रहे है। जिनके पास दुनिया भर के लोग इस कलाकार के बारे में जानने उत्सुक होकर इनके के पास आते हैं और यह पूर्ण रूप से संयोग प्रदान करते हुए उनकी जिज्ञासाओं को शांत करते है। यह कलाकार बहुत से सरकारी संस्थाओं में स्कूल कॉलेज ढ्ढढ्ढञ्ज आईडीबीसी आईआईएम जैसे बहुत से संस्थान है जहां इस कलाकार ने नाथद्वारा पिछवाई शैली से लोगों को जोड़ा और इस कला को आगे बढ़ाने में अपनी तरफ से पूर्ण रूप से समर्पित रहे। इस कला को निशुल्क सिखाई व जानकारी दी। यह कलाकार हैं 75 वर्षीय उस्ताद घनश्याम शर्मा जो आज भी 75 वर्ष की उम्र में भी आने वाले प्रत्येक व्यक्तियों को पूर्ण रूप से सहयोग करते हैं व उनकी जिज्ञासा को शांत कर उन्हें इस कला से जोड़ते है।

सरकार से उम्मीद

सरकार को नाथद्वारा पिछवाई शैली में जो कलाकार कार्य कर रहे है ऐसे कलाकारों को प्रोत्साहित कर इस कला को बचाने हेतु उन कलाकारों का सहयोग करना चाहिए। जो एक नई युवा पीढ़ी को इस कला से जोड़ सकें एवं लुप्त होती कला को बचाया जा सके।

1 COMMENT

  1. श्रीमान दिनेश जी भाई साहब को जानकारी के लिए धन्यवाद बहुत ही सुंदर पिचाई आप एवं आपके सभी साथियों द्वारा बनाई जाती है जितनी प्रशंसा की जाए कम है जय नाथ जी बाबा जी की

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