गवरी का मूल खेल, अद्भुत मेल, पेड़ ही प्राण हैं, पेड़ से ही जहान है…।
(सुनील पंडित)
हम मेवाड़ियों के जहन में एक प्रश्न अक्सर भादो और आसोज से बीच कौंधता है, वो है कि गवरी सबसे पहले कहा से शुरू हुई। कैसे गवरी का उद्गम हुआ। कैसे इसकी पहली रूपरेखा तय की गई। तो इस आर्टिकल में आपको हम बताएंगे वो घटना जिसके बाद से गवरी हमारे मेवाड़ अंचल में रमी जाने लगी और धीरे-धीरे ये मेवाड़ में रच बस गई। मैं गवरी का मुरीद हूँ। बचपन से इसको देखते देखते हमारी आंखें मोटी हो गई। आपको भी कभी गवरी देखने का सौभाग्य मिले तो जरूर देखना। प्रायः गवरी तीन चीजों के इर्द-गिर्द घूमने वाली एक सुई है जिसके एक पेंडुलम में सीधे चलने वाली तीन चीजें है। वो तीन चीजें है आस्था, इतिहास और प्रकृति। बस एक शब्द में इसके अलावा गवरी में कुछ भी नहीं है। हालांकि ये तीनों चीजे जितनी है उससे पढ़कर और महसूस करके तो हमारा जीवन कम पड़ जाए। यानी गवरी आस्था, इतिहास और प्रकृति को समेटने वाली एक त्रिवेणी है। इसीलिए तो जब भी कोई गवरी गवरी देखता है तो उसको ये अहसास होता है वो किसी पवित्रतम जलाशय में डुबकी लगाकर आया है। इसीलिए गवरी से नवऊर्जा की अनुभूति होती है। एक खिलखिलाता जवजीवन मिलता है। असल में गवरी ईश्वरीय घटना, इतिहास और प्रकृति के सामीप्य है।
ये है गवरी की रोचक चोचक जानकारी
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर श्रीकृष्ण जुगनू बताते है कि हुआ यूं कि धरती पर कोई पेड़ नहीं। छाया कहां मिलै। नौ लाख देवियां परेशान। एक उड़ते हुए सवा माणी के भौरे को देखा। पूछा कि जो पेड नहीं तो तू कहां से आया? तू तो फूलों का रसिक है। देवियों को उसने बहुत परेशान होकर बताया कि पाताल में राजा वासुकी बाड़ी में पेड हैं। 
देवियां पाताल पहुंची। एक एक देवी ने एक एक पेड़ उखाड़ा। वासुकी ने हजार फन तानकर रास्‍ता रोक लिया। देवी अंबा ने गुरज उठाया, लगी फन काटने। नागिन ने सुहाग की रक्षा मांगी। देवियों ने पेड़ चाहे। वासुकी ने कहा : धरती के लोग बहुत प्रपंची है। पेडों पर कुल्हाड़ा चलाएंगे। देवी कहा, राजा जैसल की बाडी में रोपेंगे। राजा जैसल ही रक्षा करेगा। सर चला जाए तो भी पेड़ नही कटने देगा।
एक-एक देवी पेड़ लेकर जमीं पर आई। देवियों का नाम भी इसी कारण हआ – 
पीपल लाने वाली पीपलाज माता, 
नीम लाने वाली नीमज माता, 
आम वाली अंबिका या आमज माता, 
खेर वाली खेमज (क्षेमंकरी) माता, 
उमर या उदुंबर वाली उमरा माता, 
बरगद वाली बडली माता। 
शाकंभरी, हिंगलाज, कुष्‍मांडा… सेाचकर देखिये।
पहली बार देवियों ने उनवास में लगाई थी बाड़ी
खमनोर गांव के पास, उनवास में पहली बार देवियों ने बाड़ी लगाई। सारे पेड़ों के साथ ही बरगद रोपा। राजा ने घी-दूध से सींचा मगर आबू के भानिया जोगी की सवा लाख की फौज चढ़ आई। देवी अंबा परीक्षा लेने पहुंची। रानी मेंदला (मयण्णला) के समझाने पर भी राजा ने सर दे दिया, इस अहद के साथ कि सवा लाख मानवी मरेंगे तो कहीं कुल्हाड़ा चलेगा पेड़ पर…। 
भानिया ने कुल्हाड़ा चलाया। पहले वार में दूध की धारा बही, दूसरे में पानी की धारा फूटी और तीसरे में… प्रलय ही आ गया, लहू की धारा ने सारी धरती को लाल कर दिया। देवी ने कहा- पेड़ बचे तो पृथ्‍वी बचेगी, पेड़ कटा तो प्राण घटेगा…. कितना सार्थक है गवरी का देखना। इस बार जरूर इस ख्‍याल को देखें – बड़लिया हिंदवा। गवरी का मूल खेल, अद्भुत मेल, पेड़ ही प्राण हैं, पेड़ से ही जहान है…।
 (डॉ. श्रीकृष्‍ण जुगनू – मंदिर श्री अंबामाताजी उदयपुर, पुस्‍तक 2002 में प्रकाशित मूल पाठ, मेरा चौमासा पत्रिका, भोपाल में प्रकाशित आलेख – वनवासियों का पेड पुराण’ बडलिया हिंदवा। गवरी का यह कथा आगे चलकर #सिद्धराज_जयसिंह व‌ रानी मयण्णला के साथ जुड़ गई)