कृष्ण को समझने से पहले हमें दो चीजें समझनी पड़ेगी। पहली धर्म और दूसरा आध्यात्म। धर्म एक धारा है, न की सम्पूर्ण जीवन। जबकि आध्यात्म सम्पूर्ण जीवन है एक धारा नहीं। इसीलिए शास्त्र कहते है कि धार्मिक व्यक्ति की अपनी एक विचारधारा होगी, अपने कुछ सिद्धान्त होंगे, अपने कुछ नियम होंगे इन सबसे परे धार्मिक व्यक्ति नहीं जाएगा। मतलब एक लकीर खींची होगी। जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति इन सभी से परे होकर जीवन को स्वीकार करेगा। इसीलिए धार्मिक व्यक्ति राजनीति करेगा तो तकलीफ होगी, वो नहीं कर पायेगा। क्योंकि उसकी फितरत, उसका नेचर, उसकी आत्मा ये सब स्वीकार नहीं करेगी जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति धर्म के लिए राजनीति करना भी स्वीकार करेगा। जैसा कृष्ण ने किया है। कृष्ण ने राजनीति इसलिए थोड़ी ना कि है कि उनको प्रधानमंत्री बनना था। उन्होंने तो धर्म का साथ देने के लिए राजनीति का सहारा लिया। और लोग कहते है कि भगवान तो 16 कलाओं के ज्ञाता थे फिर ये बखेड़ा क्यों खड़ा करवाया। कृष्ण कर्म पर भरोसा रखने वाले महापुरुष थे न कि चमत्कार पर जीने वाले जादूगर। भगवान ने कौरवों और पांडवों को कृष्ण और कृष्ण की सेना दोनों में से एक चुनने का अवसर दिया था। लेकिन कौरवों ने कृष्ण की सेना में भरोसा किया और पांडवों ने कृष्ण पर। तभी भगवान जान गए थे कि कौरव अधर्म के पक्षधर है और पांडव धर्म के। वैसे तो कृष्ण और उनकी 16 कलाओं पर असंख्य शास्त्र लिखे जा सकते है, मेरा ये आर्टिकल तो उनकी धूल के बराबर भी नहीं है मगर जितना कृष्ण को मैं जान पाया हूँ ओशो के माध्यम से तो वो यही है कि कृष्ण  क्षणवादी है। मतलब क्षण गहराई है न कि लंबाई चौड़ाई। इस एक क्षण में हम डुबकी लगाई तो गहराई में जा सकते है लम्बाई में ये नहीं कह सकते है कि कितना सफर तय किया है। इसी लिए कहा जाता है कि कृष्ण को पाने के लिए गहराई की जरूरत होती है न की एक पूरे जीवन की। हां गहराई से भरा जीवन हो सकता है। मगर जीवन में गहराई हो ये कहना या न कहना अनुचित है। कृष्ण मेरी नजर में ऐसे भगवान है जो भगवान भी है और भगत भी। क्यों कि जब जब कृष्ण ने किसी को दर्शन दिए है तो वो भक्त की भावना से प्रसन्न होकर दिए है न कि सालों की तपस्या और साधना देखकर। कृष्ण सिर्फ कवालिटी देखते है न की ब्रेंडिग। मुझे लगता है कि वो खुद एक मोटिवेशनल स्पीकर, मोटिवेशनल गुरु, मार्गदर्शक और जगत ज्ञाता है तो उनको वैसे भी प्रोफेशनल रहने में थोड़ा अंकम्फर्ड फील होता है। इसीलिए उनके सामने जब भी कोई अहंकार से भरकर आता है तो उनका मानमर्दन करके नृत्य की खुमारी उतारते है। फिर कालिया नाग हो, पूतना का झूठा प्रेम हो, इंद्र का प्रकोप हो, कौरवों का अहंकार हो सबको वो माचीस की तरह मसल कर रख देते है। इसके इतर वो सुदामा के लिए नंगे पांव महलों से दौड़कर आ सकते है, नानी बाई के लिए किसना खाती बन सकते है, कर्मा जाटन के हाथ से धाबड़िये (गागरा) के पर्दे में निकलकर खिंचडो खा सकते है। 
कृष्ण के जीवन राधा का बड़ा रोल है। वो हर बार कृष्ण को हर काम के लिए प्रेरित करने का काम करती है। यहां तक कि महाभारत के लिए उन्होंने युवा कृष्ण को युद्ध के लिए जाने की राह आसान की। राधा कृष्ण को साध्य मानती है न कि साधन। मतलब राधा के लिए कृष्ण सबकुछ है कुछ कुछ नहीं। इसलिये माँ राधा ने कृष्ण पर कभी आरोप नहीं लगाए, व्यंग नहीं मारा, चोट नहीं की, ना नकुर नहीं किया। मेरे ख्याल से तब से ही ये कहा जाने लगा होगा कि एक सफल   व्यक्ति के पीछे महिला का हाथ होता है। आजकल तो हाथ के साथ लाते और मुक्के भी होते है। खेर कृष्ण जब बाँसुरी बजाते है तो ग्वालबाल, पशु पक्षी काम धाम थोड़कर धुन के सहारे चले आते है। ये धुन जो है उनको हरके कला में अव्वल बनाती है। क्यों कि कृष्ण भी कुछ देर एकांत चाहते है, विश्राम चाहते है, संगीत चाहते है इसलिए हर बार अपनी बाँसुरी को होठों से लगाकर खुद से खुद की दूरी को पाटने का प्रयास करते है। कृष्ण कहते है कि विनम्रता पवित्रता की पहली सीढ़ी है। मने अहंकार से भरा व्यक्ति कभी पवित्र नहीं हो सकता है। कृष्ण जन्माष्टमी पर आपको ये आर्टिकल कैसा लगा जरूर बताएं। इस साल की श्रीनाथ जी के दर पर जन्माष्टमी पर हुई 21 तोपों की सलामी का नजारा देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं। लिंक नीचे दिया गया है।
जय श्री कॄष्ण
सुनील पंडित