श्रीमद् एकलिंगो विजयते

ये आर्टिकल लिखने से पहले मैं पूर्व की बातें याद कर रहा हूं। ऑफिस से काम निपटाकर घर के लिए रात 1 बजे रवाना हो रहा हूं। कान में ईयरफोन लगा है और मोबाइल में गाना लगा है -ओम नमो भगवते वासुदेवाय। पूरा शरीर ताल पर एकाकार हो गया है और बीट-टू-बीट तबले के साथ धडक़न घुल सी गई है। घर पहुंचते ही सारी थकान चूर-चूर हो गई और पहली बार एक ऐसे आंनद की अनुभूति महसूस हुई जो पहले कभी नहीं हुई। तब से पंडित जसराज मेरे प्रिय कलाकारों में न केवल शुमार हुए बल्कि मेरे दिल में भी समा गए।

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हिसार (हरियाणा) से करीब 70 किमी दूर एक गांव पिली मन्दौरी है। तब ये गांव पंजाब में था। वर्ष 1930, तारीख 28 जनवरी की बात है। इस दिन मेवाती घराने के सितारे पंडित मोतीराम और उनकी पत्नी कृष्णा बाई के घर में 9 वें नंबर की संतान के रूप में पंडित जसराज का जन्म हुआ। पिता गायन के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे लेकिन जब जसराज का जन्म हुआ तब वे घर ही मौजूद थे। पंडितजी को उन्होंने ही पहली घुट्टी पिलाई। शायद यही वजह रही कि पंडित मोतीराम की गायकी में जो सूर थे वो हूबहू पंडित जसराज के गले में समाहित हो गए। एक बार की बात है मोतीराम ऊंट की सवारी पर किसी प्रोग्राम से लौटकर आ रहे थे कि जसराज बच्चों के साथ खेल रहे थे। वे ऊंट से ही बैठे-बैठे बोले ये मिट्टी में खेल रहा बच्चा किसका है? किसी ने बताया ये बच्चा तो आप ही का है। तब वो ऊंट से उतरे और जसराज को गले लगाकर घर की दहलीज तक ले गए। उन्होंने उस वक्त पहनी अपनी महंगी ड्रेस का भी ख्याल नहीं किया। जसराज के परिवार में उनके मामा, चाचा, भाई-बहिन सब एक से बढ़कर एक संगीत से जुड़ी हस्तियां थी। उस वक्त तबलची और सारंगी बजाने वाले को हृय दृष्टि से देखा जाता था। स्वयं जसराज बहुत अच्छा तबला बजाते थे। उनके चाचा ज्योतिराम के साथ उनकी गजब की जुगलबंदी थी। हालांकि ये बात और है कि जसराज का मन तबले में कम और गायकी में ज्यादा बसता था। इसलिए कहीं न कहीं उनके चाचा की गायकी उनके अवचेतन में समा गई। पंडित जसराज का जन्म जिस घर में हुआ था उसकी चार पीढिय़ां भारतीय शास्त्रीय संगीत की ही पूजा करती थी। इसलिए कहा जाता है कि मेवाती घराना किसी जाति, मजहब और धर्म को नहीं मानता है, उसके लिए संगीत ही धर्म है। जसराज के सिर से मात्र चार साल की उम्र में ही उनके पिता का साया उठ गया। पिताजी के निधन के बाद उनके बड़े भाई मणिराम ने परिवार को संभाला और पिता का फर्ज निभाया। पिता के निधन के बाद ही उन्होंने अपने भाई पंडित प्रताप नारायण के कहने पर तबला सीखना शुरू किया। जसराज की अंगुलियां तबले पर थिरकने ही वाली थी कि बेगम अख्तर के सुर उनके कानों तक पहुंच गए। उस आवाज के दीवाने बनकर पंडित जसराज खोये-खोये से रहने लगे। हैदराबाद में पढ़ाई के दौरान वे स्कूल जाने के लिए तो निकलते लेकिन बीच रास्ते ही दुकान में बैठक बेगम अख्तर के गाने सुनने लगते। बेगम की एक गजल “तूने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना”  ने जसराज को दीवाना बनाकर रख दिया। अभी तक जसराज तबला नवाज ही थे। उनकी गायकी की शुरुआत की भी बिल्कुल दिलचस्प कहानी है। हुआ यूं कि लाहौर में पंडित कुमार गंधर्व का कार्यक्रम था। उसमें जसराज को तबला बजाना था और पंडित कुमार गंधर्व ने राग भीमपलासी में करतब दिखाया था। अगले ही दिन जसराज ने कमियां बता दी। इस बात से उखडक़र पंडित कुमार गंधर्व ने कह दिया कि जसराज तुम तो मरा हुआ चमड़ा पिटते हो तुम्हें रागदारी का क्या पता। ये बात पंडित जसराज को चुभ गई और कसम खाई की गायक नहीं बन जाता तब तक बाल नहीं कटवाऊंगा। उन्होंने अपने बाल 7 साल तब कटवाए जब उनको रेडियो के लिए कार्यक्रम का न्यौता मिला। 

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क्या होता है संगीत में घराना

 हिन्दुस्तानी संगीत में 10वें नंबर पर जो घराना आता है उसे मेवाती घराने के नाम से जाना जाता है। पहले हम ये बता देते है कि घराने क्या होते है। घराने का मतलब होता है गायन की वो विशिष्ठ शैली जिसका संबंध तीन-चार पीढिय़ों से हो। मतलब स्कूल ऑफ म्युजिक या फिर उनका आइडेंटी कार्ड। हालांकि घराने को मापने-तौलने के लिए कोई पैरामीटर नहीं तय किए गए है लेकिन मुख्य तौर पर संगीत में घराने का सीधे-सादे शब्दों में निष्कर्ष निकालें तो ये कह सकते है कि घराने से ही गवैये और गायकी की पहचान की जा सकती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में मेवाती घराने की अपनी अलग पहचान है। यह घराना खासकर ख्याल गायकी में संगीत के भाव पक्ष पर ज्यादा जोर देता है। इस घराने में नोट्स के माध्यम से राग के मूड का विकास ऐसे होता है जैसे बलखाती बैल किसी पेड़ से लिपटकर जीवन और मृत्यु को प्राप्त होती है। इस घराने की जिसने नींव रखी उनका नाम का उस्ताद घग्गे खां। जिनका वास्तविक नाम का उस्ताद घग्गे नजीर खान था। उस्ताद घग्गे खा के दो शिष्य काफी प्रसिद्ध थे। जिन्होंने ही मेवाती घरानों को आगे बढ़ाया था, उनका नाम था पंडित नत्थूलाल और पंडित चिमनलाल। वो पंडित जसराज के पिता के मामा थे। पंडित जसराज के पिता का नाम पंडित मोतीलाल था। मोतीलाल के नाना का नाम शिवा और नानी का नाम था पार्वती, जिससे लोग शिव-पार्वती बुलाते थे। कहा जाता है कि मोतीलाल की नानी पार्वती घग्गे खान को भाई मानती थी। मुसीबत के समय घग्गे खान की दोनों ने काफी मदद की थी। इसी बात से खुश होकर घग्गे खान ने राखी बंधवाई। साथ ही ये भी कहा कि पार्वती मैं तुम्हारी शारीरीक रूप से मदद कर पाऊ या नहीं मगर तुम दोनों बेटों (नत्थूलाल और चिमनलाल) को मुझे दे दो मैं इनको गायकी की तालिम दूंगा। इसके बाद मेवाती घराने की बागडोर जसराज के पिता, भाई और उनके बाद पंडितजी के हाथ में आई। 

आकाश से लेकर जल में छोड़ी छाप

मेवाती घराने के गायक, पद्म विभूषण, पद्म भूषण व पद्मश्री के साथ संगीत मार्तंड पंडित जसराज ने आकाश से लेकर जल तक में अपनी गायकी की अमिट छाप छोड़ी। उनके बारे मेें कहा जाता है कि वो सात महाद्वीप में गाने वाले पहले कलाकार थे। पिछले साल सितंबर में इंटरनेशल ऐस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने मंगल और बृहस्पति के बीच में पाए जाने वाले एक ग्रह का नाम उनके नाम रखा। वह इसलिए भी पहले ऐसे संगीतज्ञ बने जिन्होंने अनंत अंतरीक्ष में अपनी जगह बनाई। मेवाती घराने से ताल्लुक रखने वाले पंडित जसराज ने न सिर्फ भारत बल्कि दुनियाभर को शास्त्रीय संगीत के सुरों में पिरोने का नायाब काम किया। वे कभी अमेरिका तो कभी कनाडा में भी संगीत की तालिम देते हुए नजर आते थे। the udaipur updates शेर की तरह दहाड़ती हुई उनकी आवाज़ साढ़े तीन सप्तकों में फर्राटे से दौड़ती थी। क्या मुर्कियां, क्या गमक, क्या मींड और क्या छूट की तानें मानो फुंकार मार थी हो। यही उनकी गायकी की खासियत थी। उनके सुरों का जादू कृष्ण की मुरली की तरह है जिसे सुननेवाले सुध-बुध बिसरा देता है। संगीत के रसिक उन्हें रसराज भी कहते थे।

17 अगस्त सोमवार को इस दैदीप्यामान सितारे ने इसी अंतरिक्ष की अनंत यात्रा पर जाना तय किया। इस असार संसार में पंडित जी की साधना, उनकी गायकी और उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जाएगा। वो यहां भी और वहां भी ओम नमो भगवते वासुदेवाय हो या ओम नम: शिवाय से सुर की साधना के मार्फत भगवान की आराधना करते रहेंगे।

 सुनील पंडित 

(संगीत के जानकार, लेखक, पत्रकार)

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